सोमनाथ@70 : आततियों के ‘कलंक’ को सरदार ने समुद्री जलाभिषेक से धोया

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सरदार ने गुजराती नूतन वर्ष पर किया जीर्णोद्धार संकल्प

नेहरू की नाराज़गी को राष्ट्रपति ने किया नज़रअंदाज़

मुनशी का नेहरू को जवाब, “मेरा प्रथम कर्तव्य सोमनाथ”

आलेख : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद, 11 मई, 2021 (बीबीएन)। भारत के पश्चिमी समुद्र तट पर भारतीय संस्कृति और पौराणिक तथा ऐतिहासिक विरासत को लिए चमचमाता सोमनाथ मंदिर के जीर्णोद्धार को आज 70 वर्ष पूर्ण हुए हैं। 11 मई, 1951 को भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने नवनिर्मित सोमनाथ मंदिर का उद्घाटन एवं लोकार्पण किया था।

घोर आश्चर्य की बात यह है कि भारतीय संस्कृति तथा राष्ट्रीय स्मारक के प्रतीक सोम सोमनाथ मंदिर के उद्घाटन समारोह में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू उपस्थित नहीं थे। अल्पसंख्यकों को नाराज़ न करने की कांग्रेस की वर्तमान नीति के जनक जवाहरलाल नेहरू सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण को लेकर अपने मंत्रिमंडल के द्वितीय महत्वपूर्ण सदस्य, उप प्रधानमंत्री तथा गृह मंत्री सरदार पटेल तक को संदेह की दृष्टि से देख रहे थे, जिन्होंने ढोंगी धर्मनिरपेक्षता को हासिये पर रख कर 562 रजवाड़ों में बँटे खंड-खंड भारत को अखंड बनाने का काम किया था।

सरदार पटेल ने गुजराती नूतन वर्ष पर लिया संकल्प

15 अगस्त, 1947 को भारत स्वतंत्र हुआ। गृह मंत्री के रूप में सरदार वल्लभभाई पटेल ने कश्मीर को छोड़ कर शेष 562 रजवाड़ों का भारत में विलय कराने का महान बीड़ा उठाया, जिनमें जूनागढ और हैदराबाद के नवाबों को उंगली टेढ़ी कर भारत से जुड़ने पर विवश कर दिया। स्वतंत्रता प्राप्ति के ठीक 1551 दिनों के बाद 14 नवम्बर, 1951 को गुजरात नूतन वर्ष मना रहा था, उसी दिन सरदार पटेल देश के द्वादश ज्योतिर्लिंगों में प्रथम सोमनाथ की पुण्य भूमि पर थे। उनके साथ नेहरू मंत्रिमंडल के एक और सदस्य महान गुजरात के स्वप्नदृष्टा, ‘जय सोमनाथ’ के लेखक तथा सुप्रसिद्ध विधिवेत्ता कनैयालाल माणेकलाल मुनशी और नवा नगर (अब जामनगर) के जामसाहब दिग्विजय सिंह भी थे। सरदार पटेल इन महानुभावों के साथ खंडहर दशा में सोमनाथ मंदिर को देख कर दु:खी हो उठे। सरदार पटेल ने तत्क्षण सोमनाथ के समुद्र तट पर सोमनाथ मंदिर के जीर्णोद्धार की प्रतिज्ञा की,

“समुद्र के जल को हथेली में लेकर हम प्रतिज्ञा करते हैं कि सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण करवाएँगे।”

सरदार पटेल ने महमूद ग़ज़नवी (ग़ज़नी) के अनेक आक्रमणकारियों का शिकार बन सोमनाथ के भव्य भूतकाल के भग्नावशेष देखे। जब सरदार पटेल कनैलायाल माणेकलाल मुनशी और दिग्विजय सिंह के साथ सोमनाथ के समुद्री तट पर रेत में खुले पैरों से चल रहे थे, तब मुनशी व दिग्विजय सिंह काफ़ी देर तक मौन रहे, लेकिन फिर मुनशी ने मौन तोड़ा और कहा, ‘‘भारत सरकार को इस मंदिर का पुनर्निर्माण कराना चाहिए।” मुनशी के इस कथन को पटेल ने हाथोंहाथ लिया। उन्होंने सोमनाथ को प्रणाम किया और सागर तट से अंजलि में जल लिया और साथियों समेत सोमनाथ के जीर्णोद्धार का संकल्प व्यक्त किया।

मुनशी का सांस्कृति विरासत का दृढ़ संकल्प

गुजरात की अस्मिता के नायक कनैयालाल मुनशीजी ने 1922 में सोमनाथ मंदिर स्थल की मुलाक़ात के समय दुःख के साथ कहा था, “यह खंडित-भस्मीभूत तीर्थ स्थान हमारे अपमान और लापरवाही का स्मारक बना हुआ है। खंडहर में बंधे हुए घोड़ों की गूंजती हिनहिनाहट तथा घूमती हुई गिलहरियों को देख कर मेरा मस्तिष्क शर्म से झुक जाता है।”

श्री कनैयालाल मुनशीजी ने अपनी पीड़ा लौह पुरुष सरदार पटेल के समक्ष व्यक्त की। मुनशी के अनुरोध पर सरदार पटेल ने 13 नवम्बर 1947 को जब यहाँ स्थित खंडहर और मस्जिद की मुलाक़ात ली, तब उनका हृदय भी भग्न हो गया था और उन्होंने उसी वक़्त घोषणा की थी, “आज हम संकल्प करें कि सोमनाथ मंदिर का पुनः निर्माण होना ही चाहिए। यह हमारा परम् कर्तव्य है। इसमें सभी को भाग लेना चाहिए।”

1951 में सोमनाथ मंदिर में लिंग की प्राण प्रतिष्ठा के समय क. मा. मुनशी नेहरू मंत्रिमंडल में सद्य थे। जवाहरलाल नेहरू ने जब सोमनाथ मंदिर पुनर्निर्माण गतिविधियों में सक्रियता पर मुनशीजी को कोसा, तो मुनशी ने पत्र लिख कर नेहरू को जवाब देते हुए कहा, “सोमनाथ को धर्म, संस्कार तथा शिक्षा के केन्द्र के रूप में विकसित करना मेरा प्रमुख कर्तव्य है। इस कर्तव्य के दौरान मेरा वकील, नेता या मंत्री बनना एक अकस्मातमात्र है।”

हज़ारों भारतीयों ने ग़ज़नवी को मुँहतोड़ जवाब दिया

दंतकथाओं (किवदंतियों) के अनुसार सतयुग में सबसे पहले सोमनाथ का मंदिर सोम अर्थात् चन्द्र ने स्वर्ण का बनवाया था। त्रेतायुग में दशानन रावण ने चांदी का, द्वापर में श्री कृष्ण ने चंदन की लकड़ी का और कलियुग में पाटणपति कुमारपाल ने पत्थर से सोमनाथ मंदिर का निर्माण किया था। सरदार पटेल ने कुमारपाल द्वारा बनाए गए इस मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया और वे उन महामानवों की कोटि के महापुरुष बन गए। सन् 1026 में महमूद ग़ज़नवी से शुरू करके 1701 में औरंगज़ेब जैसे आक्रांताओं के कारण ध्वस्त इस स्थान के बारे में क. मा. मुनशी ने कहा था, “यदि सरदार हमें न मिलते, तो हमारी आँखें सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण देखने के लिए सौभाग्यशाली न बनतीं।”

महमूद ग़ज़नवी तीस हज़ार घुड़सवार, पचास हज़ार ऊँट और एक लाख पैदल सैनिकों के साथ जब 17वीं बार सोमनाथ पहुँचा, तब बीच रास्ते में पाटण के (नरेश) भीमदेव के 20 हज़ार राजपूतों ने बलिदान दिया था। ग़ज़नवी मोढेरा सूर्य मंदिर (अब बेचराजी-मेहसाणा) सहित अन्य एक हज़ार मंदिरों को तोड़ता हुआ सोमनाथ पहुँचा था। उसने सोमनाथ मंदिर के पुजारी श्री शिवराशी को पद-धन के लालच में फँसा कर मंदिर परिसर में प्रवेश किया। रा’नवघण (राव नवघण) के सेनापति महिधर तथा मंत्री श्रीधर ग़ज़नवी का सामना करने के लिए सेना सहित पहुँच गए थे। उस लड़ाई में 40 हज़ार सैनिक मारे गए। महमूद ने मंदिर को तोड़ा, मूर्ति को भ्रष्ट किया और 10 करोड़ दीनार के बराबर सम्पदा लूट कर ले गया। शादी का शेहरा बांधे दूल्हा हमीरसिंह गोहिल ग़ज़नवी की सागर जैसी सेना से अकेला लड़ा। राजस्थान के 90 वर्षीय घोघाबापा ने मंदिर की रक्षा के लिए अपने 84 पुत्रों-प्रपौत्रों के साथ बलिदान दिया।

मैं सनातनी हिन्दू, लेकिन सहिष्णुता में विश्वास रखता हूँ : प्रसाद

सोमनाथ मंदिर के जीर्णोद्धार में लगभग 4 वर्ष का समय लगा और जब मंदिर बन कर तैयार हुआ, तो उद्घाटन के लिए राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसादजी को आमंत्रित किया गया। प्रधानमंत्री नेहरू के विरोध के पश्चात् भी राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद ने नवनिर्मित सोमनाथ मंदिर के गर्भगृह में शिवलिंग की प्राण प्रतिष्ठा करते हुए अपने सार्वजनिक भाषण में कहा, “मैं मेरी श्रद्धा और दिनचर्या में सनातनी हिन्दू हूँ और सामान्यतः हिन्दू धर्म की रीति के अनुसार भगवान की उपासना और अर्चना करता हूँ। फिर भी मैं ऐसे सर्वधर्म समभाव और सहिष्णुता में भी विश्वास रखता हूँ, जिसमें अन्य धर्मावलंबी भी अपने-अपने तरीक़े से पूजा-अर्चना करने को स्वतंत्र हों।” डॉ. राजेन्द्र प्रसादजी ने अपने भाषण में यह भी कहा था, “सोमनाथ मंदिर में भारत की आत्मा समाहित है और इसके नवनिर्माण के यज्ञ का आरंभ सरदार पटेल के संकल्प तथा आकांक्षा से हुआ। सोमनाथ का मंदिर पुराण काल से भारतीय संस्कृति, श्रद्धा और समृद्धि का प्रतीक रहा है।”

ऐसी रही सोमनाथ की विकास की यात्रा

जब सरदार पटेल ने सोमनाथ पुनर्निर्माण की घोषणा की, तो समूचे सौराष्ट्र में हर्ष की लहर दौड़ा गई। भामाशाहों में होड़ लग गई। जामसाहब ने एक लाख रुपए, जूनागढ के प्रशासक शामळदास गांधी ने 51 हजार रुपए और अन्य धनपतियों ने भी धन की सरिता बहा दी। इसके बाद सोमनाथ मंदिर न्यास की स्थापना हुई। करीब तीन साल बाद 19 अप्रेल, 1950 को तत्कालीन सौराष्ट्र के मुख्यमंत्री उच्छरंग नवरंग ढेबर ने जीर्ण-शीर्ण मंदिर के गर्भगृह निर्माण के लिए भूमि खनन विधि की। 8 मई को दिग्विजय सिंह ने मंदिर का शिलान्यास किया। एक साल बाद 11 मई, 1951 को भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने समुद्र में स्नान कर सुबह साढ़े नौ बजे होरा नक्षत्र में मंदिर में शिवलिंग की प्राण प्रतिष्ठा की।

13 मई, 1965 को दिग्विजय सिंह ने गर्भगृह और सभामंडप पर कलश प्रतिष्ठा कराई तथा शिखर पर ध्वजारोहण किया। इस बीच दिग्विजय सिंह का निधन हो गया। 28 नवंबर, 1966 को मुनशी ने स्वर्गीय दिग्विजय सिंह की पत्नी गुलाब कुंवरबा की ओर से निर्माण कराए जाने वाले दिग्विजय द्वार का शिलान्यास किया। 4 अप्रेल, 1970 को मूकसेवक रविशंकर महाराज ने सोमनाथ मंदिर परिसर में सरदार पटेल की आदमकद प्रतिमा का अनावरण किया। 19 मई, 1970 को सत्य साईबाबा ने दिग्विजय द्वार का उद्घाटन किया।

1 दिसंबर 1995 को तत्कालीन राष्ट्रपति शंकरदयाल शर्मा ने नृत्यमंडप पर कलश प्रतिष्ठा कर नवनिर्मित मंदिर राष्ट्र को समर्पित किया। मंदिर निर्माण के सरदार पटेल के दृढ़ संकल्प को साकार करने में काकासाहब गाडगिल, दत्तात्रेय वामन, खंडूभाई देसाई, बृजमोहन बिड़ला, दयाशंकर दवे, जयसुखलाल हाथी, चित्तरंजन राजा, मोरारजीभाई देसाई सहित अनेक लोगों का सहयोग रहा। सोमनाथ मंदिर आज लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल के दृढ़ संकल्प का प्रतीक बना हुआ है। संभवत: इसीलिए गुजरात के प्रसिद्ध कवि नर्मद ने भी अपनी कविता में सोमनाथ को पश्चिमी गुजरात का प्रहरी बताया है।