लाख मना ले दुनिया : विरोधी करते रहें UP-DOWN, मोदी नहीं लगाएँगे LOCKDOWN : जानिए क्यों ?

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मोदी के लिए लॉकडाउन पहला विकल्प था, अंतिम कदापि नहीं !

राहुल या रोविड ? लॉकडाउन का 2020 में विरोध, 2021 में समर्थन !

MODI अगर ‘MOVID’, तो ‘COVID’ में भी ‘CO’NGRESS मौजूद !

टिप्पणी : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद, 9 मई (बीबीएन)। नरेन्द्र मोदी। लोकप्रियता के शिखर पर पहुँचने से पहले इस नरेन्द्र मोदी नाम ने लाखों-करोड़ों आलोचनाओं-बदनामियों से लेकर अभद्र शब्दों और गालियों की पराकाष्ठा को झेला है। देश में हज़ारों वरिष्ठ-अनुभवी नेताओं से लेकर छुटभैया नेताओं तक; सभी के बीच आज भी लोकप्रियता के शिखर पर रहे नरेन्द्र मोदी को नीचा दिखाने वालों का टोटा नहीं है और गालियों की झड़ी तो निरंतर 20 वर्षों से हर मिनट 20 गुना की गति से बढ़ती ही रही है।

नरेन्द्र मोदी को निकट से जानने वालों को अच्छी तरह मालूम होगा और स्वयं नरेन्द्र मोदी भी एक व्यक्ति रूप में प्राय: कहते आए हैं, “मैं कोई काम किसी के अभाव में, प्रभाव में और न ही किसी के दबाव में करता हूँ।” देश के प्रधानमंत्री के रूप में भी मोदी ने पिछले 6 वर्षों में कई बार इसी बात को दोहराया है, “भारत कोई काम न किसी के अभाव में, न प्रभाव में और न ही किसी के दबाव में करेगा।”

मोदी की ‘अभाव-प्रभाव-दबाव’ रहित काम करने की शैली प्राय: उनके व्यक्तिगत विरोधियों की संख्या बढ़ाती है, तो राजनीतिक विरोधियों को खटकती है। आज भी जब प्रधानमंत्री के रूप में नरेन्द्र मोदी पर कोरोना (CORONA) वायरस संक्रमण रोकने के लिए चौतरफ़ा दबाव बनाया जा रहा है, तब मोदी की कार्यशैली को जानने वाला सहज ही कह सकता है कि नरेन्द्र मोदी राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन (LOCKDOWN) नहीं लगाएँगे।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने राष्ट्र के नाम अपने पिछले संदेश में कहा था, “लॉकडाउन का उपयोग अंतिम विकल्प के रूप में किया जाए।” मोदी का संकेत स्पष्ट था। जिन राज्यों कोरोना की चेन तोड़ने के कई विकल्पों में कोई उपयोगी नहीं लग रहा, वे अंतिम विकल्प के रूप में अलग-अलग स्वरूपों मेंलॉकडाउन लगा रहे हैं, परंतु कोई ये मान ले कि मोदी के पास भी विकल्प नहीं है और वे अंतिम विकल्प के रूप में राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन लगाने की घोषणा करेंगे, तो ऐसा मानने वाला भूल कर रहा है। ऐसा मानने वाले भी भुलावे में ही हैं कि राजनीतिक तथा चिकित्सा विशेषज्ञों के दबाव में आकर भी मोदी लॉकडाउन लागू करेंगे।

आशा-उत्साह से परिपूर्ण नेतृत्व क्षमता के धनी हैं मोदी

नरेन्द्र मोदी ने गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में 2002 में हुए गोधरा कांड तथा गुजरात दंगों को लेकर देश ही नहीं, अमेरिका सहित पूरी दुनिया की गालियाँ खा चुके हैं। लोगों ने उन पर पत्थर फेंकने में कोई क़सर नहीं छोड़ी। एक दौर ऐसा भी था, जब राह चलता छुटभैया नेता भी मोदी को गाली देकर टीवी न्यूज़ चैनल और अख़बार में चमक जाता था, परंतु मोदी ने उन पर फेंके गए पत्थरों से ही सीढ़ी बनाई और आज देश के सर्वोच्च निर्णायक संवैधानिक पद पर हैं।

जब 2002 से 2012 यानि लगातार 10 वर्षों तक नरेन्द्र मोदी पर देश भर से विपक्षी राजनीतिक दलों और यहाँ तक कि भारतीय जनता पार्टी (BJP-भाजपा) के अंदर से भी कई नेताओं ने गालियों की बौछार चलाई, तब भी नरेन्द्र मोदी विचलित नहीं हुए और इसका उत्तम उदाहरण गुजरात विधानसभा चुनाव 2002, 2007 तथा 2012 में जीत की हैट्रिक से बड़ा क्या हो सकता है ?

वास्तव में नरेन्द्र मोदी के व्यक्तित्व का निर्माण ही कुछ इस प्रकार हुआ है कि वे निरंतर आशाओं से भरपूर रहते हैं। निराशा उन्हें छू तक नहीं सकती। गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में चौतरफ़ा आलोचनाओं को झेलने के बावजूद नरेन्द्र मोदी अपने हर भाषण में पानी से आधे भरे ग्लास का उदाहरण देते हुए कहते थे, “कुछ लोगों को ग्लास पानी से आधा भरा हुआ, कुछ को आधा ख़ाली लगता है, परंतु मेरे दृष्टिकोण के अनुसार ग्लास पूरा भरा हुआ है, जिसमें आधा पानी है और आधी हवा।” यह मोदी का आशावादी दृष्टिकोण है।

विपरीत स्थितियों में विपक्ष चलित, मोदी अविचलित

नरेन्द्र मोदी जब विपरीत स्थितियों में होते हैं, तब विपक्ष उन पर हावी होने का प्रयास करता है। वर्तमान में भी कोरोना की दूसरी घातक लहर को लेकर मोदी की चारों ओर से आलोचनाएँ हो रही हैं। विपक्ष मोदी को घेरने के लिए सारी नैतिकताएँ भुला कर स्टैण्ड तक बदल डालता है, लेकिन मोदी केवल कर्म में रत् रहते हैं। कांग्रेस पार्टी, तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी-TMC), राहुल गांधी, ममता बनर्जी सहित घोर मोदी विरोधियों में कोरोना की घातक स्थिति ‘विकृत और परोक्ष आनंद’ का विषय बना हुआ है। मोदी विरोध का मौक़ा मिलते ही ऐसे लोग ‘उन्माद’ में आकर ये भी भूल जाते हैं कि किसी मुद्दे पर उनका स्टैण्ड एक साल पहले क्या था और आज क्या है ?

बात राहुल गांधी की ही कर लीजिए। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पिछले वर्ष मार्च-2020 में जब कोरोना चेन तोड़ने के लिए अचानक लॉकडाउन लगाने की घोषणा की थी, तो इसका सबसे बड़ा और पहला विरोध राहुल गांधी ने ही किया था। राहुल ने श्रमिकों की दर्दनाक घर वापसी पर भी राजनीति करते हुए कहा था कि लॉकडाउन से कोरोना पर विजय नहीं पाई जा सकेगी। कोरोना वही है, राहुल गांधी भी वही हैं और प्रधानमंत्री भी नरेन्द्र मोदी ही हैं; लेकिन आज राहुल गांधी पुरज़ोर मांग कर रहे हैं कि कोरोना चेन तोड़ने के लिए राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन लगाना आवश्यक है। केवल मोदी विरोध के नाम पर राजनीति के लिए एक ही मुद्दे पर रुख़ बदलने वाले ऐसे ग़ैरज़िम्मेदार नेता की बात पर कोई क्यों ग़ौर करे ? जब कोई साधारण व्यक्ति को भी राहुल की बात ग़ौर करने लायक़ न लगती हो, तो देश का प्रधानमंत्री क्यों और कैसे उसे गंभीरता से लेगा ?

‘मोविड’ कहने से पहले अपनी पार्टी का नाम देख लेते राहुल !

सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि राहुल गांधी ने देश की सबसे पुरानी और वर्तमान में सबसे कम जन-समर्थन वाली कांग्रेस पार्टी के ज़िम्मेदार नेता के रूप में पिछले एक साल में देश के कोरोना विरोधी संघर्ष में केन्द्र सरकार, विशेषकर नरेन्द्र मोदी की आलोचना के अलावा कौन-सा बड़ा काम किया है, जिसकी पूरे देश में चर्चा या सराहना हुई हो ? कदाचित् कोई नहीं। मोदी को ऊपर से दबाव में देखते ही उन पर हावी होने के लिए उत्साहित रहने वाले राहुल ने हद तो तब कर दी, जब हाल ही में उन्होंने ट्वीट करते हुए ये कहा कि देश को कोविड नहीं, मोविड हुआ है ! यदि राहुल गांधी COVID के स्पेलिंग से ‘CO’ हटा कर MODI का ‘MO’ जोड़ने को बड़ा तीर मार लेना समझते हों, तो उन्हें इस बात का भी अंदाज़ा होना चाहिए कि इस फॉर्मूला से तो पूरा का पूरा कोविड ही कांग्रेस बन जाएगा, क्योंकि COVID की स्पेलिंग में CONGRESS का CO पहले से ही मौजूद है। ऐसा लगता है कि राहुल ने आलोचना करते समय भी अक़्ल का इस्तेमाल बिलकुल नहीं किया। यदि देश को कोविड नहीं, मोविड हुआ है, तो कल को कोई भी नेता राहुल की तरह बिना सोचे-समझे राहुल को रोविड, प्रियंका को प्रोविड और सोनिया को सोविड कह देगा।

मोदी निर्विकल्प नहीं, इसीलिए नहीं आएगा लॉकडाउन

पिछले साल लॉकडाउन लगाने के मोदी के फ़ैसले पर उंगली उठाने वाले आज लॉकडाउन के लिए मोदी पर दबाव डाल रहे हैं, परंतु वे यह भूल रहे हैं कि मोदी ने लॉकडाउन को अंतिम विकल्प माना है। जहाँ तक मोदी का प्रश्न है, मोदी निर्विकल्प नहीं हैं और इसीलिए उन्हें अंतिम विकल्प अर्थात् लॉकडाउन की ओर जाने की ज़रूरत ही नहीं पड़ेगी। मोदी सदैव आपत्तियों को अवसर के रूप में देखते हैं और जिन्हें अवसर दिखाई देते हैं, वे निर्विकल्प नहीं हो सकते। इसीलिए यह मान कर चलिए कि मोदी लॉकडाउन नहीं लगाएँगे।

क्या हैं मोदी के पास विकल्प ?

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी यदि लॉकडाउन नहीं लगा रहे हैं, तो इसके पीछे ज़रूर उनकी राजनीतिक, राष्ट्रीय, सामाजिक सहित हर प्रकार की रणनीति होगी। मोदी निश्चित रूप से जानते हैं कि पिछले साल अचानक लॉकडाउन लागू किए जाने से करोड़ों भारतीयों को परेशानी हुई थी, तो अर्थ व्यवस्था ठप हो गई थी। ऐसे में मोदी सरकार ने सबसे पहले तो संघीय ढाँचे के अनुरूप गत वर्ष 2020 में अनलॉक प्रक्रिया शुरू होने के साथ ही सभी राज्यों को अपने-अपने ढंग तथा आवश्यकता के अनुसार लॉकडाउन लगाने की छूट दे रखी है और हर राज्य अपने हिसाब से लॉकडाउन लगा भी रहे हैं। जहाँ तक राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन का प्रश्न है, तो देश का मुखिया होने के नाते मोदी और उनकी सरकार को व्यापक हित में निर्णय करने हैं और ऐसे में मोदी के पास लॉकडाउन के अतिरिक्त कई विकल्प हैं, जिनमें एक ओर बढ़ते कोरोना मामलों पर नियंत्रण, कोरोना गाइडलाइन का कड़ाई से अनुपालन, अस्पतालों, बेड, ऑक्सीजन को लेकर प्रशासन के समक्ष अचानक आई मरीज़ों की बाढ़ से निपटने, नए बेड-ऑक्सीजन प्लांट, ऑक्सीजन का अन्य देशों से आयात सहित कई विकल्प शामिल हैं। इसके अलावा सबसे दमदार विकल्प है कोरोना टीकाकरण अभियान में तेज़ी लाना। अनुभवों के आधार पर कहा जा सकता है कि कोरोना नियंत्रण का सबसे दमदार उपाय मास्क, सोशल डिस्टेंसिंग तथा हर प्रकार के नियंत्रणों का पालन करना है। मोदी सरकार निश्चित रूप से लॉकडाउन से इतर इन विकल्पों को कड़ाई से लागू करेगी, परंतु यह निश्चित है कि मोदी के लिए लॉकडाउन पहला विकल्प अवश्य था, परंतु अंतिम विकल्प कदापि नहीं है।