न्याय-अन्याय : गालियाँ नहीं, गोलियों के हक़दार हैं मोदी; मार दो, मर जाएगा कोरोना !

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विशेष टिप्पणी : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद, 6 मई (बीबीएन)। 2537 दिनों में 2537 लाख करोड़ से अधिक बार ‘भारत, भारत, भारत’ का रटन करने वाले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी इन दिनों देश के उन मौक़ापरस्तों के लिए अपनी राजनीति को ज़िंदा रखने का सबसे मज़बूत माध्यम बन गए हैं, जिनकी राजनीति केवल नरेन्द्र मोदी के विरोध के नाम पर चलती है।

देश में कोरोना संक्रमण की भीषण लहर, ऑक्सीजन की कमी, दम तोड़ते कोरोना मरीज़ों, रोते-बिलखते परिजनों के चित्र और दृश्य देख कर हर इंसान का दिल बैठा जा रहा है और चहुँओर से एक ही आवाज़ आ रही है, “मोदी सरकार फेल, प्रशासनिक सिस्टम फेल, स्वास्थ्य क्षेत्र में कुप्रबंधन।” इनमें कोरोना भुक्तभोगियों से भी अधिक ऊँची आवाज़ मोदी विरोध के नाम पर राजनीति करने वालों उन दिलजलों की है, जो प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से नरेन्द्र मोदी के कोरोना अपराधी घोषित कर रहे हैं।

क्या मोदी ही कोरोना अपराधी हैं ?

यदि एक आम भारतीय के रूप में गहराई से विचार किया जाए, “क्या देश में चल रही भयावह कोरोना लहर के सबसे बड़े अपराधी नरेन्द्र मोदी ही हैं ?”, तो आपका मन कोरोना पर अपना उल्लू सीधा करने वालों से हट कर कई सकारात्मक पहलुओं पर चिंतन-मनन करने को विवश हो जाएगा। जो भारतीय सकारात्मक चिंतन-मनन करेगा, वह निश्चित रूप से इस बात को पूरी तरह स्वीकार नहीं करेगा कि कोरोना संक्रमण के लिए केवल नरेन्द्र मोदी उत्तरदायी हैं।

74 वर्षों में सबसे भीषण त्रासदी, तो सबसे सक्रिय नेतृत्व भी

इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता कि स्वतंत्र भारत के 74 वर्ष में पहली बार देश इतनी भीषण त्रासदी से गुज़र रहा है। शासन-प्रशासन के कुप्रबंधन, लापरवाही और उसका शिकार हो रहे आम भारतीयों के कलेजे से निकल रही आह निश्चित रूप से किसी भी नेतृत्व को परेशान और विचलित कर सकती है, परंतु यदि भारत के 74 वर्ष के स्वतंत्र इतिहास में कोरोना सबसे भयावह त्रासदी है, तो यह भी उतना ही कटु सत्य है कि इन 74 वर्षों में देश के 14 प्रधानमंत्रियों में सबसे एक्टिव-सबसे सक्रिय नेतृत्व नरेन्द्र मोदी का ही रहा है। नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री बने आज 2537 दिन हो चुके हैं। मोदी के आलोचकों और उन्हें गालियाँ देने वाले भी इस सत्य को नकार नहीं सकते कि प्रधानमंत्री रहते हुए नरेन्द्र मोदी ने इन 2537 दिनों में 2537 क्षण का भी विश्राम नहीं लिया।

बंगाल चुनाव की आड़, पर मोदी तब भी काम पर थे

कोरोना संक्रमण के विकराल रूप धारण करने के लिए नरेन्द्र मोदी को ज़िम्मेदार ठहराया जा रहा है। विशेष रूप से पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2021 की आड़ लेकर मोदी विरोध का मौक़ा तलाशने वाले कई विपक्षी नेता तो नरेन्द्र मोदी को सीधे-सीधे कोरोना अपराधी क़रार देने से भी नहीं कतरा रहे, परंतु वास्तविक तथ्यों के साथ बात की जाए, तो मोदी ने भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ता के रूप में यदि बंगाल में चुनावी रैलियाँ कीं, तो प्रधानमंत्री के रूप में भी पूरे चुनाव के दौरान वे दिल्ली में बैठकों का दौर करते रहे। बंगाल चुनाव के दौरान ही नरेन्द्र मोदी ने दिल्ली में कोरोना को लेकर कई उच्च स्तरीय बैठकों और मुख्यमंत्रियों के साथ वर्चुअल मीटिंगों का सिलसिला भी जारी रखा। नरेन्द्र मोदी अपनी आदत और अपनी धुन के अनुसार 24 में से 18-18 घण्टे काम करते हैं। स्थितियाँ साधारण हो या असाधारण, मोदी के कार्य घण्टों में कोई फ़र्क़ नहीं दिखाई देता। हालाँकि यह बात भी सही है कि गुजरात के मुख्यमंत्री से लेकर भारत के प्रधानमंत्री बनने तक मोदी के कार्यकाल में गुजरात या देश की स्थिति भले ही साधारण से लेकर उत्तम होती रहीं, परंतु राजनीतिक रूप से मोदी के लिए हमेशा असाधारण स्थितियाँ ही रही हैं।

नीतियों में त्रुटि संभव, नीयत में नहीं

आज भी देश के कोरोना पीड़ितों से लेकर साधारण नागरिक तक इस बात को मान भी लेंगे कि मोदी या उनकी सरकार की नीतियों में कोई त्रुटि है, जिसके कारण कोरोना की रोकथाम करने में सफलता नहीं मिल रही, परंतु कुछ लोगों को छोड़ कर कोई भी आम भारतीय नरेन्द्र मोदी की नीयत पर प्रश्नचिह्न नहीं लगा रहा। जो नरेन्द्र मोदी की निरंतर सक्रियता तथा उनके सकारात्मक पहलुओं के पारखी हैं, वे अच्छी तरह जानते हैं कि मोदी ने अपने लगभग 20 वर्षों के शासकीय-प्रशासकीय कार्यकाल में कई आपदाओं को अवसर में पलटा है। यह सही है कि मोदी इस समय अब तक की सबसे बड़ी आपदा से गुज़र रहे हैं, परंतु मोदी की नब्ज़ जानने वालों को भरोसा है कि वे भारत को इस सबसे बड़ी मुश्किल घड़ी से सुरक्षित उबारने में सफल होंगे।

गालियों की बौछार, गोलियों से मार दो कोरोना को

अब लाख टके का सवाल यही है कि मोदी ही कोरोना संक्रमण के सबसे बड़े अपराधी हैं ? कोरोना संक्रमण फैलने के लिए मोदी को ज़िम्मेदार मानते हुए उन पर चौतरफ़ा गालियों और अपशब्दों से हमले किए जा रहे हैं। कुछ विपक्षी नेता दिखावटी संयमित भाषा में भद्रता के साथ, तो सोशल मीडिया के शूरवीर संयम की सारी सीमाएँ लांघ कर अभद्रता के साथ नरेन्द्र मोदी पर गालियों की बरसात कर रहे हैं, लेकिन मोदी के लिए गालियाँ नहीं, चुनौतियाँ नई बात होती है। नरेन्द्र मोदी 2002 के गोधरा कांड और गुजरात दंगों के बाद लगातार गालियाँ झेलते रहे हैं और समय-समय पर गालियों की तीव्रता बढ़ती रही है। हालाँकि इस बार गालियाँ लाखों बाणों की तरह बरसाई जा रही हैं, परंतु एक व्यक्ति को करोड़ों लोग यदि कोरोना का अपराधी मानते हैं, तो न्याय यही कहता है कि ऐसे व्यक्ति को गोली मार दो, शायद उस व्यक्ति के साथ-साथ कोरोना भी मर जाए !

पहला पत्थर वो मारे, जिसने पाप न किया हो

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर गालियों की बरसात करने वालों से सीधा सवाल यह है कि देश में स्वास्थ्य सेवाएँ अकेले केन्द्र सरकार का दायित्व नहीं है। देश में 33 राज्य हैं, जिनमें 28 राज्यों में तो जनता द्वारा निर्वाचित मुख्यमंत्री शासन कर रहे हैं और उन मुख्यमंत्रियों में भारतीय जनता पार्टी के अलावा कांग्रेस सहित कई विपक्षी दलों के भी हैं। क्या संघीय ढाँचे की मूल भावना यह नहीं है कि सुदृढ़ भारत के निर्माण में राज्यों की सुदृढ़ भूमिका हो ? मान लिया जाए कि मोदी ने बंगाल चुनाव में राजनीतिक रुचि लेकर कोरोना पर लापरवाही की, परंतु चुनाव वाले पाँच राज्यों को छोड़ दें, तो शेष 28 राज्यों में वहाँ के मुख्यमंत्री और प्रशासक क्या कर रहे थे ? यदि चुनाव के कारण कोरोना संक्रमण बढ़ा, तो बंगाल सहित पाँच चुनावी राज्यों में ही बढ़ना चाहिए था, पूरे देश में क्यों बढ़ा ? यदि पूरे देश में बढ़ा और मोदी कुछ नहीं कह रहे थे, तो इन राज्यों के मुख्यमंत्रियों पर भी सवाल उठाए जाने चाहिए कि वे क्या कर रहे थे ?

यह समय आरोप-प्रत्यारोप का नहीं, सामूहिक उत्तरदायित्व का

भारत अपने इतिहास की सबसे भीषण और भयावह त्रासदी का सामना कर रहा है। संकट की इस घड़ी में केन्द्र और राज्यों में सत्तारूढ़ तथा विपक्ष में बैठे सभी राजनीतिक दलों का कर्तव्य यह है कि वे केन्द्र या राज्यों में सत्तारूढ़ दलों के विरुद्ध आरोप-प्रत्यारोप लगाने के स्थान पर ज़रूरतमदों की उसी तरह सहायता करें, जिस प्रकार चुनाव में उनसे वोट हासिल करने के लिए करते हैं। इतना ही नहीं, देश पर आए इस महाविनाशकारी संकट से निपटने का उत्तरदायित्व अकेले सरकारों का नहीं है और संकट की विकरालता को देख कर सहज ही कहा जा सकता है कि सरकारें चाहें, तो भी अकेले इससे निपट नहीं सकतीं। ऐसे में राजनीतिक दलों और आम जनता का सामूहिक उत्तरदायित्व बनता है कि हर नागरिक संविधान में प्राप्त अधिकारों के साथ-साथ कर्तव्यों के दिशा-निर्देश की भी अनुपालना करे और केवल सरकार के भरोसे बैठे न रहते हुए अपने कर्तव्यों से राष्ट्र की सेवा करने का प्रयास करे।