इतिहास साक्षी है : संकट में और झिलमिला उठते हैं नरेन्द्र मोदी के सितारे

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20 वर्षों से मोदी के ‘पीछे’ पड़े विरोधी ‘सनक’ में कर जाते हैं ‘राष्ट्रीय’ भूल

विवादास्पद मुद्दों पर ‘मौन’ ही मोदी की सबसे बड़ी शक्ति तथा रणनीति

आत्मघाती हो जाता है मोदी विरोध के नाम पर किसी भी हद तक जाना

विरोध की सनक ‘द्रोह’ की पराकाष्ठा बन जाती है मोदी के लिए नई आशा

विश्लेषण : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद, 20 मई (बीबीएन)। नरेन्द्र मोदी को सत्ता और चुनाव की राजनीति में आज 7,022 दिन हो चुके। इतिहास साक्षी है कि लगभग 20 वर्षों की इस अवधि में जब-जब नरेन्द्र मोदी संकट में घिरे, तब-तब उनके भाग्य के सितारे और अधिक चमक के साथ झिलमिलाए हैं।

गुजरात (GUJARAT) में लगभग 13 वर्षों तक मुख्यमंत्री रहे और पिछले 7 वर्षों से देश के प्रधानमंत्री के रूप में कार्यरत् नरेन्द्र मोदी फिर एक बार संकटों में घिरे हुए दिखाई दे रहे हैं। देश में कोरोना की दूसरी लहर के लिए येन-केन-प्रकारेण नरेन्द्र मोदी को ज़िम्मेदार ठहराने पर आमादा मोदी विरोधी यह मान रहे हैं कि वे इस बार मोदी का काम तमाम कर देंगे, परंतु मोदी के राजनीतिक इतिहास को निकट से देखने वालों को भली-भाँति मालूम है कि मोदी पर संकट के बादल मोदी विरोधियों को ख़ुश करने वाला भ्रममात्र है। शीघ्र ही ये आभासी बदल छँट जाएँगे और मोदी फिर एक बार नई ऊँचाई तथा सुदृढ़ता के साथ उभरेंगे, क्योंकि वास्तव में मोदी पर कोई संकट है ही नहीं। मोदी पर संकट केवल मोदी विरोधियों को दिखाई दे रहा है और अपने इस भ्रम में वे पिछले बीस वर्षों से ग़लतियाँ करते आए हैं, जिसका हमेशा मोदी को फ़ायदा ही हुआ है।

पिछले 20 वर्षों से नफ़रत की राजनीति का शिकार रहे नरेन्द्र मोदी (NARENDRA MODI) को राजनीतिक रूप से ख़त्म कर देने की कोशिश में लगे मोदी विरोधी हर बार हर मुद्दे को इतना बड़ा बनाने की कोशिश करते हैं कि उनकी कोशिश में साज़िश की घुसपैठ हो जाती है। मोदी विरोध की सनक में मोदी विरोधी टोली इस हद तक जाने की भूल कर बैठती है कि मोदी विरोध राष्ट्रीय अस्मिता से जुड़ जाता है, जो मोदी विरोधियों को मुँह के बल गिरा देता है।

हर बार की तरह इस बार भी कोरोना (CORONA) महामारी पर मोदी को घेर कर अपना राजनीतिक उल्लू सीधा करने में जुटे कांग्रेस सहित सभी राजनीतिक दल और पूरे देश में सक्रिय मोदी विरोधी टोली ने मोदी पर चारों ओर से हमले किए और मोदी विरोध करते-करते राष्ट्र की प्रतिष्ठा को हानि पहुँचाने तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि बिगाड़ने तक की हद तक चले गए। मोदी विरोधियों की यही सनक उन्हें बैकफुट पर ले जाती है, तो मोदी को और मज़बूत बना देती है।

इतिहास साक्षी है कि मोदी पर जब-जब संकट आए और उन पर जितने पत्थर फेंके गए, तब-तब मोदी के लिए उन सभी आभासी संकटों में पड़े तमाम पत्थरों ने सीढ़ी का ही काम किया है। यही मोदी की विशेषता भी रही है कि मोदी ने उन पर पड़ने वाले हर पत्थर का उपयोग अपने लिए रास्ता बनाने बनाने में किया, जिसका जीता-जागता उदाहरण है कि नरेन्द्र मोदी छोटे से राज्य गुजरात के मुख्यमंत्री से देश के प्रधानमंत्री के पद तक पहुँचने में सफल हुए।

नरेन्द्र मोदी ने सत्ता तथा चुनाव की राजनीति में तो 1 अक्टूबर, 2001 को प्रवेश किया, परंतु 149 दिनों तक वे केवल गुजरात के मुख्यमंत्री थे। 27 फरवरी, 2002 को गोधरा कांड हुआ और नरेन्द्र मोदी के मुख्यमंत्री से राष्ट्रीय स्तर पर सर्वाधिक चर्चित नाम बनने की यात्रा शुरू हुई, जो आज 19 वर्षों के बाद भी जारी है।

गोधरा कांड और गुजरात दंगों से शुरू हुआ सिलसिला

गोधरा कांड के बाद 27 फरवरी, 2002 की देर रात से ही गुजरात में साम्प्रदायिक दंगे भड़क गए और 28 फरवरी, 2002 से लगातार चार दिन इन साम्प्रदायिक दंगों ने इतना विकराल स्वरूप धारण किया कि गुजरात के मुख्यमंत्री पद पर बैठे नरेन्द्र मोदी देखते ही देखते पूरे देश में कांग्रेस सहित सभी विपक्षी दलों के निशाने पर आ गए, तो चहुँओर नफ़रत की ऐसी आंधी चली, जिसने नरेन्द्र मोदी पर प्रश्नचिह्नों के अंबार लगा दिए।

गोधरा कांड तथा गुजरात दंगों के काल में केन्द्र में प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी (BJP-बीजेपी) नीति राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग-NDA) की सरकार थी। दशकों से ढोंगी धर्मनिरपेक्षता के नाम पर राजनीतिक रोटियाँ सेकने वालों को कई बार की तरह इस बार भी भाजपा के विरुद्ध मज़बूत मुद्दा मिला था। वह वाजपेयी थे, जिन्होंने धर्मनिपरेक्षता का ढोंग करने वालों के विरुद्ध 1 वोट से अपनी सरकार का त्याग कर दिया था, जबकि ये नरेन्द्र मोदी थे, जो इन तथाकथित धर्मनिरपेक्ष टोली की नफ़रत की राजनीति की आंधी के बीच भी गुजरात के मुख्यमंत्री पद पर बने रहे और एनडीए में शामिल सहयोगी दलों के दबाव के बावजूद भाजपा नरेन्द्र मोदी को गुजरात के मुख्यमंत्री पद से हटाने का साहस न कर सकी।

गालियों-पत्थरों की बरसात, मोदी के लिए बनी वरदान

गुजरात दंगों के बाद नरेन्द्र मोदी पर गालियों और पत्थरों की भीषण वर्षा हुई, जो मोदी के लिए वरदान बनती गई। फरवरी-2002 से मोदी लगातार ढोंगी धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक दलों और राष्ट्रव्यापी कट्टरपंथियों के निशाने पर रहे, परंतु गुजरात सहित देश का एक बड़े वर्ग में मोदी महानायक बनते गए। मोदी ने विरोधियों के पत्थरों से गुजरात और अपने विकास की ऐसी सीढ़ी बनाई, जो उन्हें देश के प्रधानमंत्री पद तक ले गई।

मोदी विरोध की सनक में ख़ुद ही फँसते गए विरोधी

मोदी को गुजरात में कांग्रेस राजनीतिक रूप से घेरने की कोशिश करती रही, तो राष्ट्रीय स्तर पर मोदी विरोधियों की टोली का लगातार विस्तार होता गया, परंतु मोदी विरोध की सनक में मोदी विरोधी (ANTI MODI) ख़ुद ही फँसते गए, क्योंकि सनक में समझदारी नहीं होती। यही कारण है कि मोदी विरोधी ख़ुद नहीं समझ पाए कि वे मोदी का विरोध करते-करते कब गुजरात विरोधी बन गए। मोदी ने अपने ऊपर हो रहे हमलों का रुख़ गुजरात की ओर मोड़ दिया और इसी कारण गुजरात ने मोदी को तीन-तीन चुनावों में जीत दिलाई।

अमेरिकन वीज़ा से लेकर सद्भावना मिशन

2002 से 2012 आने तक मोदी विरोधियों के कारण मोदी लगातार राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में रहे। मोदी विरोधियों ने मोदी का कद लगातार बढ़ाया, क्योंकि विरोधियों के पास मोदी विरोध तो था, पर मुद्दा नहीं था। गुजरात दंगों के नाम पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मोदी को बदनाम करने वाली टोली की सनक उन्हें गुजरात के बाद पूरी दुनिया में भारत की छवि बिगाड़ने की पराकाष्ठा तक ले गई, जिसके चलते अमेरिका ने मोदी को वीज़ा देने से इनकार कर दिया। यह अमेरिकी इनकार मोदी विरोधियों की सबसे बड़ी हार सिद्ध हुआ, क्योंकि अमेरिका का इनकार भारत (INDIA) के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप माना गया और भारत सरकार तथा सत्तारूढ़ भाजपा ही नहीं, बल्कि भाजपा-मोदी विरोधी राजनीतिक दलों को भी अमेरिका के विरुद्ध मोदी के समर्थन में आना पड़ा।

एक दशक तक गुजरात दंगों को लेकर विरोधियों की गालियों और पत्थरों का सामना करने वाले मोदी ने सभी नकारात्मक प्रचार को नज़रअंदाज़ करते हुए गुजरात को विकास की नई ऊँचाई पर पहुँचाया और 2002 के बाद ‘सबका साथ-सबका विकास’ के मंत्र के साथ दोबारा दंगे नहीं होने देकर आम जनता में यह विश्वास सुदृढ़ किया कि शांति में ही भलाई है। अपनी इसी बात को राष्ट्रीय स्तर पर पहुँचाने के लिए मोदी ने सद्भावना मिशन चलाया, जिसे विरोधियों ने ढोंग बताया। तथाकथित राजनीतिक पंडितों ने सद्भावना मिशन को मोदी की राष्ट्रीय राजनीति में दस्तक के रूप में चित्रित किया, परंतु मोदी का इरादा साफ़ था। वे भारत सहित दुनिया को बताना चाहते थे कि अल्पसंख्यकों पर अत्याचार के नाम पर की जा रही उनकी और गुजरात की बदनामी में कोई दम नहीं है।

हर विरोध राष्ट्र विरोधी षड्यंत्र सिद्ध हुआ

नरेन्द्र मोदी 26 मई, 2014 को प्रधानमंत्री बना। छह दिन बाद ही उन्हें प्रधानमंत्री बने 7 वर्ष हो जाएँगे। मोदी को पहले गुजरात में, फिर प्रधानमंत्री बनने से नहीं रोक पाने वाली मोदी विरोधी टोली ने पिछले 7 वर्षों में कई मुद्दों पर मोदी को पूरी तरह चपेट में लेने का प्रयास किया, परंतु आधारहीन सनक हर बार राष्ट्र विरोधी (ANTI NATIONAL) षड्यंत्र सिद्ध हुई। सीएए के नाम पर मोदी विरोध के सनकियों ने शाहीन बाग़ को नया अड्डा बनाया, जो राष्ट्र विरोधियों का षड्यंत्र सिद्ध हुआ। इसी प्रकार मोदी विरोधियों ने किसान आंदोलन की आड़ लेकर मोदी विरोध का अवसर ढूँढा, लेकिन यहाँ भी ट्विटर टूलकिट (TWITTER TOOLKIT) के ज़रिये उनकी अंतरराष्ट्रीय साज़िश का पर्दाफ़ाश हुआ। ताज़ा मामला कोरोना संक्रमण के लिए मोदी को ज़िम्मेदार ठहराने की कोशिश का है। यहाँ भी मोदी विरोधियों ने मोदी को मात देने के लिए राष्ट्रीय अस्मिता को चोट पहुँचाने की पराकाष्ठा कर दी। मोदी विरोध की सनक ऐसा सन्निपात बनी कि राष्ट्र विरोधी टूलकिट तक बना दिया गया, जैसा कि किसान आंदोलन के दौरान बनाया गया था।

मोदी का मौन ही सबसे बड़ी शक्ति

पिछले 20 वर्षों से मोदी विरोध के नाम पर राष्ट्र की छवि बिगाड़ने की सीमा पार कर देने वाले मोदी विरोधियों की यही सनक और भूल मोदी को हर आभासी संकट के बाद मज़बूत बना कर उभारती है, क्योंकि मोदी हमेशा आपत्ति को अवसर में बदलने का माद्दा रखते हैं। गुजरात दंगों से लेकर अब तक नरेन्द्र मोदी जब-जब बड़े संकटों में घिरे और विरोधियों ने उन पर हमले किए, तब-तब मोदी ने मौन को ही सबसे बड़ा शस्त्र बनाया। गुजरात दंगों के बाद जब मोदी से सीधे-सीधे प्रश्न किए जाते थे, “आपने मुसलमानों को मरवाया। मुसलमानों को मार रहे हिन्दुओं को रोका नहीं”, तब भी मोदी सटीक और संक्षिप्त उत्तर देकर मौन हो जाते थे। आज भी जब कोरोना महामारी की दूसरी लहर के लिए चहुँओर से मोदी को ज़िम्मेदार ठहराया जा रहा है, राजनीति के मैदान से लेकर सोशल मीडिया तक पर उन पर गालियों और पत्थरों की बरसात की जा रही है, तब भी मोदी मौन हैं और यही उनकी सबसे बड़ी शक्ति है, लेकिन इतिहास इस बात का भी साक्षी है कि संकट में मौन होकर निष्ठापूर्वक कर्तव्य कर्म करने वाले मोदी संकट से बाहर आते ही विरोधियों को चारों खाने चित्त करते रहे हैं और इस बार भी मोदी इसी अवसर की प्रतीक्षा में हैं।