‘I@27’ : ‘बनने’ का नहीं था सपना, ‘करने’ का था संकल्प और आरंभ हुई एक ‘अनंत’ यात्रा

0
180

वैचारिक क्रांति के मंच bhavybhaaratnews.com को भी हुआ एक वर्ष

कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद, 18 अप्रैल, 2021 (बीबीएन)। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की एक निरंतर सोच है, “जीवन में कभी भी कुछ ‘बनने’ के सपने नहीं देखने चाहिए, अपितु कुछ ‘करने’ के संकल्प संजोने चाहिए। ‘बनने’ का सपना टूट सकता है, परंतु ‘करने’ का संकल्प अवश्य कुछ न कुछ ‘बना’ देता है।”

नरेन्द्र मोदी ने न केवल यह वाक्य और सिद्धांत अपनाया, बल्कि स्वयं आत्मसात् भी किया। कदाचित् इसी कारण नरेन्द्र मोदी एक साधारण नागरिक, एक अनुशासित संगठन तथा उसी संगठन से बने राजनीतिक दल के एक साधारण कार्यकर्ता से विधायक, मुख्यमंत्री बने और आज देश के सर्वोच्च प्रधानमंत्री पद तक पहुँचने में सफल हुए, क्योंकि मोदी ने अपने कथनानुसार स्वयं कभी कुछ ‘बनने’ का नहीं, वरन् कुछ ‘करने’ के सिद्धांत का पालन किया।

मैं न तो नरेन्द्र मोदी के समकक्ष हूँ और न ही उनके समान दृढ़ संकल्पवान तथा सक्षम, परंतु आज जब मैं पत्रकारिता क्षेत्र में अपने 27 वर्ष पूर्ण कर रहा हूँ, तब इतना अवश्य कह सकता हूँ कि मैंने भी कभी पत्रकार ‘बनने’ का सपना तो क्या, कल्पना भी नहीं की थी, परंतु 18 अप्रैल, 1994 को ‘करना’ आरंभ किया और आज पत्रकार ‘बन’ भी गया और ‘बना’, तो ऐसा ‘बना’, जिसमें की जाने वाली यात्रा अनंत है, क्योंकि कोई कर्मचारी या अधिकारी सेवानिवृत्त हो सकता है, परंतु कोई कर्मशील विशेषकर एक पत्रकार की यात्रा उसके जीते-जी कभी समाप्त नहीं होती। जब तक उसके हाथ चलते हैं, तब तक कलम या की-बोर्ड पर उंगलियाँ चलती ही रहती हैं।

छात्रकाल की अनिवार्यता बना कौशल

जी हाँ। 27 वर्ष पूर्व आज ही का वह दिन था, जब मैंने जाने-अनजाने पत्रकारिता क्षेत्र में पदार्पण किया। 18 अप्रैल, 1994 को मैंने अहमदाबाद से प्रकाशित होने वाले हिन्दी दैनिक ‘यंगलीडर’ में साधारण अनुवादक के रूप में नौकरी शुरू की।

मुझे नहीं मालूम था कि छात्रकाल में गुजराती संदर्भ पुस्तिकाओं से पढ़ कर हिन्दी में उत्तर लिखने की अनिवार्य मेरा एक अनुवादक के रूप में निर्माण कर रही है। दरअसल मैं गुजरात में रह कर हिन्दी माध्यम में पढ़ाई कर रहा था, परंतु ‘गाइड-अपेक्षित’ आदि सभी संदर्भ पुस्तिकाएँ गुजराती भाषा में होती थीं। ऐसे में मैं गुजराती संदर्भ पुस्तिकाओं से पढ़ता था और परीक्षा में प्रश्नों के उत्तर हिन्दी में लिखता था।

बस यही कौशल मुझे यंगलीडर में पहली नौकरी दिलाने में काम आया। यंगलीडर में ही मेरा धीरे-धीरे पत्रकार के रूप में निर्माण हो रहा था, परंतु मैं कदाचित् इसे लेकर इतना जागृत नहीं था। मेरा अगला पड़ाव ‘राजस्थान पत्रिका’ (अहमदाबाद संस्करण) बना, जहाँ मेरे भीतर पड़ी पत्रकारिता पूर्णत: खिल उठी। आगे की यात्राएँ भी मेरे अनुभवों को बढ़ाती गईं और वनइंडिया.कॉम, टीवी9 गुजराती से युवाप्रेस.कॉम जैसे हिन्दी-गुजराती मीडिया की यात्रा करते होते हुए आज मैं आख्या मीडिया सर्विस में सेवा दे रहा हूँ और साथ अपनी स्वयं की वेबसाइट bhavybhaaratnews.com का संचालन भी कर रहा हूँ, जो हिन्दी-गुजराती दोनों भाषाओं में कार्यरत् है।

‘करने’ का संघर्ष ‘बनाता’ गया

आज जिस स्थान पर मैं पहुँचा हूँ, उसके विषय में कभी कल्पना भी नहीं की थी। न ही मेरा कोई यह सिद्धांत ही था कि कभी कुछ ‘बनने’ का नहीं, कुछ ‘करने’ का सपना देखना चाहिए। न कोई सिद्धांत, न कोई लक्ष्य और न ही कोई सपना था। बस, ‘करता’ गया और ‘करने’ के इस लम्बे संघर्ष ने मुझे यह ‘बना’ दिया। एक कर्मशील के रूप में अनुवादक की नौकरी से आरंभ हुई मेरी यात्रा ने मुझमें पड़े लेखक, चिंतक, विचारक, टिप्पणीकार, विश्लेषक जैसे कई गुणों को विकसित किया, जिससे मुझे वैचारिक क्रांति का अपना एक मंच आरंभ करने की प्रेरणा मिली।

bhavybhaaratnews.com की भी पहली वर्षगाँठ

अपनी कलम से वैचारिक क्रांति लाने के उद्देश्य से ही मैंने अपनी पत्रकारिता के 26 वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर गत 18 अप्रैल, 2020 को भव्यभारतन्यूज़.कॉम का शुभारंभ किया था। भव्यभारतन्यूज़.कॉम केवल जानकारियाँ या सूचनाएँ देने वाला मंच नहीं है, बल्कि उसके नाम के अनुसार भव्य भारत के निर्माण में वैचारिक योगदान देने का यज्ञ है। इसी उद्देश्य से आरंभ हुआ यह मंच आगे भी निरंतर राष्ट्र, धर्म, समाज तथा भारत सहित सम्पूर्ण विश्व के हर व्यक्ति के कल्याण, भलाई और जनजागरण का महाभियान चलाता रहेगा।