जयंती विशेष : कभी उभरने ही नहीं दिया गया अंबेडकर का यह ‘सच’

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अंबेडकर ने कश्मीर में धारा 370 पर नेहरू का प्रचंड विरोध किया

कांग्रेस ने जीते-जी दो चुनाव हरवाए, निधन के बाद हासिए पर धकेला

अंबेडकर ने डीए, ईएसआईसी, आरबीआई सहित कई अमूल्य भेंट दीं

साभार : रमेश तन्ना लिखित पुस्तक ‘समाजनी सुगंध’ में प्रकाशित किशोर मकवाणा लिखित पुस्तक ‘महामानव डॉ. बाबासाहब अंबेडकर’ पर आधारित आलेख

अहमदाबाद, 14 अप्रेल, 2021 (बीबीएन)। डॉ. भीमराव बाबासाहब अंबेडकर। यह नाम सुनते ही हर साधारण भारतीय के मन में पहला शब्द ‘संविधान निर्माता’ और अगले ही क्षण ‘दलितों के मसीहा’ शब्द भी उभर आता है, परंतु वास्तविकता यह है कि अंबेडकर की इस प्रकार की सीमित छवि ने विशाल अंबेडकर पर बड़ा आवरण खड़ा कर दिया। इसका सबसे बड़ा कारण तथाकथित राजनेताओं की वोट बैंक की राजनीति है, जिन्होंने अंबेडकर को सीमित दायरों में बांध कर उनकी विराट छवि को समाज के एक वर्ग विशेष में बांध दिया।

भारत रत्न डॉ. भीमराव बाबासाहब अंबेडकर की आज 130वीं जयंती है और इसी उपलक्ष्य में हम अंबेडकर के जीवन तथा कार्यों के उन पहलुओं को देशवासियों के समक्ष उजागर करने जा रहे हैं, जिनके साधारण भारतीय समाज आज तक अछूता रहा है।

हम अंबेडकर जयंती पर यह विशेष आलेख गुजरात के विख्यात साहित्यकार किशोर मकवाणा की पुस्तक ‘महामानव डॉ. बाबासाहब अंबेडकर’ को आधार पर प्रस्तुत कर रहे हैं। RAA POSITIVE MEDIA के संस्थापक तथा लेखक, साहित्यकार एवं पत्रकार रमेश तन्ना ने अपनी ‘पॉज़िटिव स्टोरीस’ पर आधारित पुस्तक ‘समाजनी सुगंध’ में किशोर मकवाणा, अंबेडकर पर उनकी गूढ़ शोध तथा उस पर आधारित उनकी पुस्तक पर जो विशेष आलेख लिखा है, उसी को आधार बना कर हम अंबेडकर का विराट रूप आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहे हैं।

मकवाणा ने कराया अंबेडकर के विराट स्वरूप का दर्शन

किशोर मकवाणा (दाएँ) तथा रमेश तन्ना (बाएँ)

गुजराती लेखक-साहित्यकार-पत्रकार किशोर मकवाणा ने अपनी पुस्तक ‘महामानव डॉ. बाबासाहब अंबेडकर’ के माध्यम से लोगों के समक्ष सच्चे व सम्पूर्ण अंबेडकर के विराट स्वरूप का दर्शन कराने का प्रयास किया है।

अध्ययनशील व कर्मशील लेखक किशोर की पुस्तक ‘महामानव डॉ. बाबासाहब अंबेडकर’ के अनुसार डॉ. बाबासाहब अंबेडकर राष्ट्रीय नेता हैं। वैश्विक नेताओं की सची बनायी जाए, तो अंबेडकर अधिकारपूर्वक अग्रिम पंक्ति में स्थान पाने में सक्षम हैं, क्योंकि उनके व्यक्तित्व व कर्तृत्व उत्तम थे। मकवाणा ने कुंडली मार कर वर्षों तक लगातार शोध-अनुसंधान (रिसर्च) कर सच्चे, समग्र व बृहद डॉ. बाबासाहब अंबेडकर को प्रस्तुत किया है। इस आलेख में आप आगे जो कुछ भी पढ़ेंगे, वह सारा किशोर मकवाणा की पुस्तक ‘महामानव डॉ. बाबासाहब अंबेडकर’ पर आधारित है।

हम कश्मीर का पेट भरें और कोई अधिकार न रखें !

अंबेडकर ने एक बार कहा था, ‘जब-जब मेरा व्यक्तिगत हित तथा समग्र राष्ट्र हितों के बीच संघर्ष हुआ है, तब-तब मैंने राष्ट्र हित को ही प्राथमिकता दी है, अपने हित को गौण माना है।’ अंबेडकर ने राष्ट्रीय एकता सुदृढ़ करने के लिए केन्द्र सरकार का ज़ोरदार विरोध किया था। कश्मीर को विशेष दर्ज़ा देने के लिए शेख अब्दुल्ला प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू से मिले। नेहरू ने विधि मंत्री अंबेडकर से मिलने को कहा। अब्दुल्ला को सुन कर अंबेडकर ने उनसे स्पष्ट शब्दों में कहा, ‘आप चाहते हैं कि भारत कश्मीर की रक्षा करे, सड़कों का निर्माण करे, लोगों को खाने के लिए अनाज दे और फिर भी कश्मीर पर भारत का कोई अधिकार न रहे ! आपकी यह बात मैं कदापि नहीं स्वीकार सकता।’ शेख अब्दुल्ला क्रोधित होकर पुन: नेहरू के पास गए। नेहरू ने संविधान सभा के सदस्य गोपालस्वामी आयंगर को निर्देश देकर संविधान में धारा 370 जुड़वाई। अंबेडकर ने इसका विरोध किया था।

किशोर मकवाणा कहते हैं, ‘अंबेडकर के समर्थक व विरोधी ईमानदार नहीं हैं। फलस्वरूप अंबेडकर की वास्तविक छवि लोगों के समक्ष प्रकट ही नहीं हुई। किसी भी समाज की सर्वांगीण प्रगति की जड़ सकारात्मक सामाजिक जागरण में ही है। अंबेडकर की अनेक चिंताओं के विषयों में सामाजिक जागृति का विषय स्थाई व सदाकालीन थे। संपूर्ण मानव जाति का उत्तराधिकारी बनने योग्य विश्व मानव को जब जातिगत संकीर्ण बाड़े में क़ैद कर दिया जाता है, तब उस महापुरुष के विषय में ग़लतफ़हमी होना स्वाभाविक है।’

टुकड़ों में बाँट दिया गया अंबेडकर को

अंबेडकर को समझने में ‘टुकड़ा पद्धति’ बहुत चली है। अंबेडकर को ज़्यादातर टुकड़ों में देखा जाता है। इसलिए अंबेडकर को कभी भी संपूर्ण व सत्य स्वरूप में समझा नहीं जा सका। अंबेडकर ने आजीवन दलितों की, अस्पृश्यों की चिंता की और पूरा जीवन उनके प्रति समर्पित किया। उन्होंने उत्कर्ष तथा समृद्धि की वैचारिक खिड़कियाँ तो खोली हीं, परंतु यह संदेश भी दिया, ‘किसी भी स्थिति में विरोध ही करना है और विरोध करने में सारी शक्ति तथा समय व्यय करना योग्य नहीं है।’

डॉ. बाबासाहब भीमराव अंबेडकर को उनके समर्थक दलित नेता तथा संविधान निर्माता के रूप में ही पहचानते हैं। अन्य लोग भी उन्हें दलित नेता व संविधान निर्माता के रूप में जानते हैं। अंबेडकर की बात आते ही ‘संविधान निर्माता’ तथा ‘दलितोद्धारक’ इन दो विषयों पर ही विचार होता है।

शोधकर्ता तथा लेखक किशोर मकवाणा कहते हैं, ‘ऐसे दृष्टिकोण के कारण इस महान व वैश्विक व्यक्ति की पहचान एक निश्चित वृत्त (सर्किल) में क़ैद होकर रह गयी। वास्तव में अंबेडकर का व्यक्तित्व इस परिचय से काफ़ी विराट तथा उत्तुंग है। वे अर्थशास्त्री थे, समाजशास्त्री थे, इतिहासकार थे, विदेश नीति के विशेषज्ञ थे, राष्ट्र प्रहरी थे, विधिवेत्ता थे, श्रमिक समस्याओं के मर्मज्ञ थे, धर्मज्ञाता थे, श्रमिकों के तारणहार थे, लेखक थे, पत्रकार थे और श्रेष्ठ शिक्षाविद्-प्राध्यापक भी थे। अंबेडकर नारी सशक्तीकरण के प्रखर हिमायती थे। अंबेडकर के व्यक्तित्व के ऐसे अनेक पहलुओं में से किसी एक को ही पकड़ कर आप अंबेडकर को जानने का प्रयास करेंगे, तो उनकी अब तक परंपरागत व स्थापित परिचय काफ़ी अधूरा लगेगा।’

किशोर मकवाणा कहते हैं, ‘अंबेडकर के जीवन का विशद् अध्ययन करते हैं, तो उनकी जीवन धारा के पाँच मोड़ देखने को मिलते हैं। जीवन के प्रारंभ में ज्ञान साधना, उसके बाद अस्पृश्यता तथा सामाजिक विषमता के विरद्ध समता का संघर्ष, तीसरा मोड़ है लोकतंत्र के प्रहरी के रूप में, उसके बाद आता है भारतीय संविधान निर्माता के रूप में भूमिका और जीवन के अंत में तथागत बुद्ध की सरण।

वामपंथ-कांग्रेस विरोधी अंबेडकर के साथ भारी अन्याय

अंबेडकर के साथ दो प्रकार से अन्याय हुआ है। दलितों ने उन्हें संविधा निर्माता व अपना उद्धारक मान लिया। उन्हें ‘जय भीम’ के नारे तक सीमित कर दिया। अदलितों (जो दलित नहीं हैं) ने उन्हें दलितों के मसीहा के खाते में डाल दिया। भारत के वामपंथियों ने अंबेडकर का अपनी सुविधा के अनुसार उपयोग कर लिया। अंबेडकर के निधन के बाद वामपंथियों ने उन्हें कैप्चर कर अपनी अनुकूलता के अनुसार उनका उपयोग किया। वास्तविकता तो यह है कि अंबेडकर वामपंथी विचारधारा के घोर विरोधी थे। वे इस विचारधारा को लोकतंत्र विरोधी, हिंसक व अराजकता फैलाने वाली मानते थे।

इसी प्रकार अंबेडकर सार्वजनिक जीवन में आए, तभी से कांग्रेस के विरोधी थे। कांग्रेस पार्टी ने तो उन्हें स्वतंत्र भारत के प्रथम चुनाव में मुंबई लोकसभा सीट पर एक दूधवाला के विरुद्ध हरवा दिया था, तो 1954 में भी भंडरा लोकसभा उप चुनाव में कांग्रेस ने उन्हें हरवाने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। उनके निधन के बाद कांग्रेस ने उन्हें हासिए पर ही धकेल दिया था। उनके साथ हर ओर से भारी अन्याय हुआ।’

अंग्रेज़ों की ‘आर्य आक्रमण’ की थियरी खारिज़

डॉ. बाबासाहब अंबेडकर हिन्दू धर्म के विरोधी नहीं थे, वे बुराइयों के विरोधी थे। वे बुराइयाँ मिटाने के लिए संघर्ष करते रहे। वे हिन्दू धर्म के सुधारक थे। वे दृढ़तापूर्वक मानते थे कि यदि हिन्दू धर्म की कुरीतियाँ दूर होंगी, चातुर्वर्ण्य आधारित वर्ण व्यवस्था दूर होगी, तभी देश का विकास होगा। अंबेडकर राष्ट्र से प्रेम करते थे। इसीलिए उन्होंने अंग्रेज़ों द्वारा चलाए गए आर्य आक्रमण के झूठे दुष्प्रचार को अनुसंधान (रिसर्च) के आधार पर गपबाज़ी ठहरा दिया। उन्होंने आर्य आक्रमण की बात सिरे से ही खारिज़ कर दी थी।

नेशन फर्स्ट के पक्षधर अंबेडकर

अंबेडकर ने दबे-कुचले, शोषित, वंचित समाज के प्रति अपना समग्र जीवन समर्पित किया था। दूसरी बात, वे मानते थे कि हिन्दू धर्म से कुरीतियाँ-कुप्रथाएँ दूर होनी चाहिए और तीसरी बात, वे नेशन फर्स्ट के दृष्टिकोण के पक्षधर थे। वे मानते थे कि अस्पृश्यता से सवर्णों का भी नुक़सान हुआ और अछूतों की बुद्धि शक्ति/बुद्धि क्षमता का राष्ट्र के विकास में उपयोग नहीं किया जा सका।’

श्रमयोगियों-कर्मयोगियों को दे गए अनेक सौगातें

अंबेडकर ने राष्ट्र के विकास के लिए अनेक क्षेत्रों में योगदान किया है, परंतु यह बात कोई विस्तार से जानता ही नहीं है। उनका योगदान ऐसा-वैसा नहीं है, दृष्टिपूर्ण है, बुनियादी है। अंबेडकर ने भारत को जिन विभागों की भेंट धरी, उनकी छोटी-सी सूची से ही उनके बहुमूल्य योगदान का अहसास हमें हो आता है। यह रही वह सूची : * रोज़गार कार्यालय की स्थापना (Employment Exchange), * कर्मचारी राज्य बीमा (Employment State Insurance, * कार्य का समय 12 घण्टे था, जिसे घटा कर 8 घण्टे किया (Working Hours Limit), * महिलाओं को प्रसूति के दौरान छुट्टी (maternity Leaves), * ट्रेड यूनियन को मान्यता (Compulsory Recognition For Trade Union), * महंगाई भत्ता (Dearness Allowance-DA), * छुट्टी के दौरान वेतन यानी सवेतन छुट्टी (Paid Holiday), * स्वास्थ्य बीमा (Health Insurance), * हड़ताल के लिए क़ानूनी अधिकार (legal Strike Act), * प्रोविडेंट फंड (Provident Fund), * श्रमिक कल्याण कोष (Labour Welfare Fund), * तकनीकी प्रशिक्षण योजना (Technical Training Scheme), * केन्द्रीय सिंचाई आयोग (Central Irrigation Commission) * वित्त आयोग का प्रावधान (provision Of Finance Commission), * मताधिकार (Right To Vote), * भारतीय सांख्यिकी क़ानून (Indian Stastistical Law), * केन्द्रीय टेक्निकल पावर बोर्ड (Central Technical Power Board), * हीराकुंड बांध (Hirakund Dam), * दामोदर घाटी परियोजना (Damodar Valley Project), * उड़ीशा (अब ओडीशा) नदी परियोजना (Orissa River Project) * भाखड़ा नांगल बांध (Bhakhara Nangal Dam), * सोन नदी घाटी परियोजना (The Son River Valley Project), * रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया (Reserve Bank Of India), * भारतीय संविधान (Indian Constitution)। यह सूची अभी और लंबी हो सकती है। उनके राष्ट्र विकास के इस अमूल्य योगदान को उनके निधन के बाद भुला दिया गया। इसके लिए उत्तरदायी है कांग्रेस, कुछ मुट्ठी भर दलित नेता तथा लाल सलाम (वामपंथी)।

शौक़ के लिए नहीं, इसलिए गए विदेश

डॉ. बाबासाहब अंबेडकर तेजस्वी विद्यार्थी थे। वडोदरा में उन्हें रहने के लिए घर नहीं मिला। छुआछूत के कई कड़वे अनुभव हुए। इसलिए वे अपनी वेदना के अनुभव साझा करने के लिए वडोदरा रजवाड़े के महाराजा सयाजीराव गायकवाड के पास पहुँचे। उस समय वडोदरा के महाराजा सयाजीराव गायकवाड चार अछूत विद्यार्थियों को विदेशाभ्यास के लिए भेजना चाहते थे। सयाजीराव ने अंबेडकर के समक्ष सामने से प्रस्ताव रखा, ‘कहिए, आपको पढ़ाई के लिए विदेश जाना है ?’ अंबेडकर के मन में विचार आया, ‘यदि मैं विदेश जाकर पढ़ूँगा, तो भारत वापस आकर दबे-कुचले वर्ग के उत्कर्ष के लिए काफ़ी काम कर सकूँगा’ और वे विदेशाभ्यास के लिए तैयार हो गए।

जाति-बुरखा प्रथा और ट्रिपल तलाक़ राष्ट्र के लिए संहारक

डॉ. बाबासाहब अंबेडकर जाति प्रथा के विरोधी थे। उनका मानना था कि जाति राष्ट्र के लिए संहारक है। यदि जाति प्रथा जाएगी, तभी भारत का सच्चा विकास होगा। उनके ध्यान में जापान का एक उदाहरण आया। जापान में समुराई नामक जाति के लोग स्वयं को उच्च वर्ण का मानते। जापान के शासक भाँप गए कि जाति प्रथा रहेगी, तो विकास अवरुद्ध होगा। ऐसा हुआ भी। जापानी शासकों ने यह भेद मिटाया और इसके चलते जापान तेज़ी से विकास कर पाया। अंबेडकर मानते थे कि यदि जातिवाद हटेगा, तभी सभी लोगों की शक्ति का संयोजन किया जा सकेगा। उन्होंने कहा था, ‘हमारे राष्ट्र की उन्नति व दुनिया के राष्ट्रों में हम मान-सम्मान पाने की इच्छा रखते हैं, तो सामाजिक विषमता को दूर करना होगा। आंतरिक वैमनस्य रहेगा, तब तक राष्ट्रीय भावना उत्पन्न नहीं होगी।’

अंबेडकर मुस्लिम महिलाओं की बुरखा प्रता को सामाजिक दूषण मानते थे, तो साथ ही साथ तीन तलाक़ की परंपरा को भी उन्होंने अमानवीय क़रार दिया था। अंबेडकर ने अपनी पुस्तक ‘थॉट्स ऑन पाकिस्तान’ में इन दोनों बुराइयों के विषय में विस्तार से लिखा है। अंबेडकर बुरखा प्रथा को लेकर कहते हैं, ‘बुरखा प्रथा मुस्लिम महिलाओं के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। बुरखा प्रथा एक बुराई है और उसे धार्मिक मान्यता दे दी गयी। ऐसे दूषण को ख़त्म करने का कभी कोई प्रयास नहीं हुआ है। मुस्लिम महिलाओं का मस्जिद में प्रवेष निषेध है और घर के बाहर जाना हो, तो बुरखा पहन कर ही उन्हें निकलना पड़ता है। इसके कारण उनके स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। बुरखा से न केवल शारीरिक, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य भी प्रभावित होता है।’

लोकतंत्र के लिए ख़तरा है वंशवाद

अंबेडकर भारत के संविधान में धारा 370 जोड़ने के कड़े विरोधी थे। तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने ज़िद करके 370 को संविधान में जुड़वाया। अंबेडकर मानते थे कि भारत, लोकतंत्र के लिए वामपंथी-साम्यवादी जोखिमकारक हैं। वे यह भी मानते थे कि वंशवादी/परिवारवादी शासन लोकतंत्र के लिए ख़तरे के समान है। उनका स्पष्ट मत था कि लोकतांत्रिक स्वस्थता के लिए मज़बूत विपक्ष होना चाहिए।

महिला सशक्तीकरण के पक्षधर

डॉ. बाबासाहब अंबेडकर महिला सशक्तीकरण के पक्षधर थे। उन्होंने कहा था, ‘कोई भी समाज प्रगतिशील है या नहीं, यह परखना हो, तो यह जान लेना चाहिए कि उस समाज या राष्ट्र में महिलाएँ कितनी शिक्षित हैं ? महिलाओं की शिक्षा ही सम्बद्ध समाज की प्रगतिशीलता का पैमाना है।’ अंबेडकर ग़रीब महिलाओं से कहते, ‘अच्छे-स्वच्छ कपड़े पहनिए। भले आप झोंपड़ी में रहते हों, लेकिन फिर भी सहूर (सुव्यवस्थित) से रहें। दूषणों व व्यसनों का विरोध करें। आपका पति शराब पीता हो, तो उसे घर में न घुसने दें।’

अपने ‘सपने’ को संबोधित न कर सके अंबेडकर

लोकनिष्ठ राजनेता तैयार करने के लिए डॉ. बाबासाहब अंबेडकर ने एक इंस्टीट्यूट शुरू किया था। ट्रेनिंग स्कूल फॉर एंट्रेंस टु पॉलिटिक्स यानी राजनीति प्रवेश प्रशिक्षण संस्थान (Training School For Entrance To Politics)। इस संस्थान के प्रथम बैच में 15 विद्यार्थी थे। उन्हें जनता के उत्तम प्रतिनिधि बनाने का प्रशिक्षण दिया गया था। समग्र विश्व के संविधानों की समझ, विश्व के लोकतंत्र की समझ, भारतीय संविधान की समझ, उत्तम वक्ता बनने की युक्ति, लोकसभा तथा संसदीय सदनों की समझ… यह सब उन्होंने संस्थान के पाठ्यक्रम में शामिल किया था। इस संस्थान के माध्यम से अंबेडकर कुशल राजनेता तैयार करना चाहते थे। 10 दिसंबर, 1956 को वे वे इस संस्थान की प्रथम बैच को संबोधित करने वाले थे, परंतु चार दिन पूर्व ही 6 दिसंबर, 1956 को केवल 65 वर्ष की आयु में उनका असामयिक निधन हो गया। राष्ट्र के लिए उत्तम, कुशल व प्रतिबद्ध जनप्रतिनिधि तैयार करने का उनका वह सपना इस प्रकार अधूरा ही रह गया।

1924 में डॉ. बाबासाहब अंबेडकर ने ‘बहिष्कृत हितकारिणी सभा’ की स्थापना की थी। वे दलितों से कहते, ‘शिक्षित बनिए, संगठित होइए और समाज का कल्याण कीजिए।’ दलितोत्कर्ष की प्रक्रिया बताते हुए उन्होंने कहा था, ‘बच्चों के लिए संस्कार केन्द्र होने चाहिए, छात्रालय व पठनालय होने चाहिए, कृषि के लिए आधुनिक शिक्षा दी जानी चाहिए और अछूत युवाओं को प्रशिक्षण लेकर व्यवसाय शुरू करना चाहिए।’