किशन V/S किसान : ‘सत्य’ की परीक्षा में ‘सत्य’ की जीत के लिए ‘पीछे हटना’ हार नहीं !

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मंथन : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद, 6 जनवरी, 2021 (बीबीएन)। कहते हैं ‘सत्य’ हर स्थिति में ‘सत्य’ ही रहता है। चाहे दिन हो, रात्रि हो, गर्मी हो, सर्दी हो, जागृत हो या सुषुप्त हो… ‘सत्य’ कभी नहीं बदलता और ‘सत्य’ का शाश्वत सत्य यह है कि ‘सत्य’ सदैव विजयी होता है, वह कभी पराजित हो ही नहीं सकता। अत: जब ‘सत्य’ को ‘सत्य’ सिद्ध करने की परीक्षा हो, तो ‘सत्य’ की विजय के लिए कभी-कभी ‘एक पग पीछे’ हटना भी पराजय नहीं कहलाता… यदि लक्ष्य ‘सत्य’ की विजय का हो तो।

आज हम चर्चा करने जा रहे हैं लगभग डेढ़ महीने से चल रहे किसान आंदोलन की। भारत में 8 केन्द्र शासित सहित 36 राज्य हैं और इनमें से कुछ राज्यों के किसान केन्द्र सरकार के विरुद्ध मोर्चा खोल कर बैठे हैं। देश के 36 राज्यों में से 90-95 प्रतिशत राज्यों यानी 30 से अधिक राज्यों के किसान इस आंदोलन में प्रत्यक्ष रूप से भाग नहीं ले रहे हैं। ऐसे में कुछ राज्यों के कुछ किसानों के आंदोलन से देश के लगभग 9 करोड़ किसानों को ध्यान में रख कर लाए गए कृषि सुधार अधिनियमों को वापस लेना उचित होगा ?

‘किशन’ : किसान के साथ या ईमान के साथ ?

यहाँ ‘किशन’ शब्द का व्यापक अर्थ है। किशन अर्थात् कृष्ण अर्थात् सत्य। देश के आम आदमी के मन में एक ही प्रश्न उठ रहा है कि कृषि सुधार अधिनियमों को लेकर ये ‘सत्य’ अर्थात् ‘किशन’ किसके साथ है ? किशन किसान के साथ है या ईमान के साथ ? स्वाभाविक रूप से किशन यानी सत्य ईमान का ही साथ देगा। अब यह कौन तय करेगा कि ईमान किसके साथ है ? किसानों के साथ है या शासन के साथ है ? तो कृषि सुधार अधिनियम को लेकर शासन ईमानदार है या नहीं ? किसानों की अधिनियमों को जड़ से उखाड़ फेंकने की मांग के साथ ईमान है या नहीं ? इन दोनों बातों का निर्धारण करने का कार्य अब किसान, शासन और न्यायपालिका के ज़िम्मे है। जहाँ तक किसानों का सवाल है, तो वे सीधे-सीधे अधिनियमों को वापस लेने की मांग पर अड़े हैं, तो शासन के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती दिल्ली की सीमाओं पर डटे किसानों को उनके घर भेजने की है, परंतु वह किसी भी स्थिति में अधिनियम वापस लेने के पक्ष में नहीं है।

यही है सर्वश्रेष्ठ विकल्प

जैसा कि मैंने ऊपर कहा कि ‘सत्य’ की अंतिम विजय के लिए कभी-कभी ‘सत्य’ से कुछ क्षण समझौता करना पड़े या ‘सत्य’ से पीछे हटना पड़े, तो भी उसमें कोई बुराई नहीं हो सकती। जरासंध ने जब मथुरा पर आक्रमण किया, तब ‘किशन’ यानी सत्य स्वरूप कृष्ण ने मथुरा से पलायन ही तो किया था। उन्होंने स्वयं को ‘रणछोड़’ (रण छोड़ने वाला) कहलवाने में भी संकोच नहीं किया, क्योंकि कृष्ण ‘सत्य’ का रूप थे और वे जानते थे कि जरासंध रूपी असत्य का संहार करके ही ‘सत्य’ की विजय हो सकती है, परंतु जब जरासंध ने मथुरा पर आक्रमण किया, तब जरासंध के संहार का समय नहीं आया था।

यदि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार को भी लगता है कि कृषि सुधार अधिनियम किसानों के व्यापक एवं दीर्घकालीन हित में है और नीति-नीयित में कोई खोट नहीं है, तो समय की मांग के अनुरूप सरकार को अधिनियम के वास्तविक ‘सत्य’ की विजय के लिए कुछ समय के लिए अधिनियमों को निलंबित करने की सुप्रीम कोर्ट की सलाह पर विचार करना चाहिए। यदि मोदी सरकार मानती है कि ‘किशन’ यानी ‘सत्य’ उसके साथ है, ईमान उसके साथ है, तो कुछ समय के लिए तीनों कृषि विधेयकों को निलंबित करने यानी ‘पीछे हटने’ का निर्णय करने में संकोच या हीनता का अनुभव नहीं करना चाहिए। कड़ाके की ठंड, बेमौसम बरसात के बीच ‘नहीं समझने या नहीं मानने’ की ही मानो ज़िद लेकर बैठे किसानों के हित में सरकार को कुछ समय के लिए व्यापक हित को नज़रअंदाज़ कर देना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट की सलाह ही सर्वश्रेष्ठ विकल्प है। ऐसा करने से न तीनों कृषि संशोधन अधिनियम निरस्त होंगे और न ही लागू रहेंगे। इससे किसान और शासन दोनों का मान बना रहेगा और बाद में वार्ता के माध्यम से ‘सत्य’ पर विजय पाना आसान हो जाएगा। इतना ही नहीं, यह भी स्पष्ट करने में सुविधा हो जाएगी कि कृषि संशोधन अधिनियमों के मामले में किशन यानी सत्य किसके साथ था ? किसान के या शासन के ?