होगी तीसरी ‘अगस्त क्रांति’ : इस बार 1 मिशन से 4 मिथक तोड़ने की तैयारी…

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पिछली बार जुलाई की हलचल ने धारा 370 का कलंक मिटाया

जुलाई-2020 की हलचल ने छेड़ा ‘चतुष्कलंक’ विध्वंसक युद्ध

लेह, लोहा और मोदी हैं गरम, तोड़ेंगे एक-एक भरम ?

विश्लेषण : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद (4 जुलाई, 2020)। वर्ष 1942 से 2018 यानी 76 वर्षों तक भारत में एक ही ‘अगस्त क्रांति’ की चर्चा होती थी, जिसने 200 वर्षों की दासता से भारत को मुक्ति दिलाई थी। 1942 में महात्मा गांधी के नेतृत्व में भारत ने अंग्रेज़ी साम्राज्य के विरुद्ध जो निर्णायक लड़ाई छेड़ी, वह थी‘अंग्रेज़ो, भारत छोड़ो आंदोलन’। 9 अगस्त, 1942 को छेड़ा गया यह आंदोलन भारत को स्वतंत्रतता प्राप्त करवा कर ही माना और इसीलिए ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ अगस्त क्रांति के नाम से भी विख्यात हुआ।

स्वतंत्रता के बाद भारत हर वर्ष अगस्त के महीने में उस ‘अगस्त क्रांति’ को ही याद करता था, जिसने देश को स्वतंत्रता प्रदान की, परंतु प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पिछले वर्ष इस ‘अगस्त क्रांति’ में एक नया अध्याय जोड़ दिया, जब गृह मंत्री अमित शाह ने 5 अगस्त, 2019 को राज्यसभा में जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन विधेयक प्रस्तुत किया। 6 अगस्त को लोकसभा ने भी इस विधेयक को पारित कर दिया।

मोदी-शाह की इस ‘अगस्त क्रांति’ ने भारत के मस्तक जम्मू-कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग बनने तथा भारत की मुख्य धारा से जोड़ने में सबसे बड़ी बाधा धारा 370 से मुक्ति दिलाई। जो जम्मू-कश्मीर 72 वर्षों तक एक अनावश्यक धारा के कारण भारतीय धरा में होकर भी अलग धारा में बह रहा था, उसे मोदी की ‘अगस्त क्रांति’ ने एक ही झटके में भारत की मुख्य धारा में ला खड़ा किया।

हर अगस्त क्रांति से पहले जुलाई में रही हलचल

भारत के इतिहास में पहली ‘अगस्त क्रांति’ 1942 में हुई, जिसमें ‘मिशन स्वतंत्रता’ पूरा किया गया, तो दूसरी ‘अगस्त क्रांति’ 2019 में हुई, जिसमें ‘मिशन कश्मीर’ पूरा किया गया। इन दोनों ही ‘अगस्त क्रांतियों’ की विशेषता यह थी कि इनके लिए हलचलें स्वाभाविक रूप से जुलाई में ही शुरू हो चुकी थीं।

कांग्रेस ने भले ही 8 अगस्त, 1942 को ‘अगस्त क्रांति’ का निर्णय किया, परंतु महात्मा गांधी ने इसका खाक़ा जुलाई में ही खींचा था। ठीक उसी प्रकार मोदी-शाह ने 2019 में मिशन कश्मीर के लिए जो ‘अगस्त क्रांति’ की, उसकी तैयारियाँ और हलचलें जुलाई में ही शुरू हो चुकी थीं।

पूरे देश को याद होगा कि जुलाई-2019 में जम्मू-कश्मीर में क्या हो रहा था ? एक ओर मोदी सरकार दिल्ली सहित विभिन्न हिस्सों से अतिरिक्त सुरक्षा बलों को जम्मू-कश्मीर के लिए रवाना कर रही थी, तो दूसरी ओर जम्मू-कश्मीर के स्थानीय नेताओं फारुख़ अब्दुल्ला, ओमर अब्दुल्ला, महबूबा मुफ़्ती तथा अलगाववादियों को शिकंजे में लेने का पूरी प्लानिंग कर ली गई थी।

कश्मीर में अतिरिक्त अतिरिक्त सुरक्षा बलों की दनदनाहट फारुख़, ओमर और महबूबा के दिलों की धड़कनें बढ़ा रही थी, तो अलगाववादी सकते में थे। कश्मीर को अपनी जागीर समझने वालों को अंदेशा हो आया था कि मोदी सरकार कश्मीर पर कुछ ‘बड़ा’ करने वाली है और 5 अगस्त, 2019 को मोदी-शाह ने संशयों के सारे बादल छाँटते हुए कुछ ‘बड़ा’ कर ही दिया। ‘बड़ा’ भी ऐसा-वैसा नहीं, यह एक प्रकार से भारत में दूसरी ‘अगस्त क्रांति’ थी, जिसने भारत के चरणों में धारा 370 मुक्त जम्मू-कश्मीर धर दिया।

फिर जुलाई में हलचल तीसरी ‘अगस्त क्रांति’ का संकेत ?

अब प्रश्न यह उठता है कि अब तक हुई दोनों ही ‘अगस्त क्रांतियों’ की पूर्वयोजना का आधार जुलाई ही रहा और इस वर्ष भी जुलाई का प्रारंभ ही प्रचंड रहा है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 3 जुलाई को अचानक लेह-लद्दाख पहुँच कर चीन के दुस्साहस को ख़ुली चुनौती दी, ख़ुलेआम ललकारा। इतना ही नहीं, मोदी ने चीन सहित पूरी दुनिया को यह भी दिखा दिया कि 130 करोड़ नागरिकों का यह देश किसी भी शक्तिशाली देश की कुटिलता के आगे नतमस्तक नहीं होगा।

जब जुलाई का प्रारंभ ही इतना प्रचंड हुआ है, तो अभी तो पूरे 26 दिन बाक़ी हैं। कल्पना कीजिए कि मोदी ने लेह में सैन्य कमांडरों और जवानों के बीच, उनके साथ 5-6 घण्टे बिताए, तो क्या केवल बातें की होंगी ? नहीं, जुलाई-2019 की तरह जुलाई-2020 भी ‘अगस्त क्रांति’ का संकेत दे रहा है।

लेह में मोदी के संबोधन के एक-एक अक्षर, शब्द, वाक्य से लेकर चाल-ढाल, हाव-भाव, बॉडी लैंग्वेज सब कुछ एक ही इशारा कर रहे हैं कि अबकी बार-फाइनल वार, अबकी बार-फाइनल वॉर की रणभेरी बज चुकी है। मोदी ने लेह पहुँच कर चीन ही नहीं, बल्कि पाकिस्तान के साथ भी निर्णायक ‘अगस्त क्रांति’ के बीज बो दिए हैं।

भारत की पहली ‘अगस्त क्रांति 1942’ में दासता की बेड़ियाँ तोड़ीं, तो दूसरी ‘अगस्त क्रांति 2019’ में जम्मू-कश्मीर को वास्तव में भारत का अभिन्न अंग बनाने का मिशन सफल बनाया गया, परंतु अब जिस तीसरी ‘अगस्त क्रांति 2020’ के होने के आसार हैं, उसमें भारत एक मिशन से चार मिथक तोड़ने वाला है।

टूटेंगे पीओके, सीओके, एलओसी तथा एलएसी के मिथक ?

जी हाँ ! प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के मनोविज्ञान को जानने वाला हर व्यक्ति इस बात को आसानी से समझ सकता है कि वे किसी भी समस्या को जड़ से उखाड़ने में विश्वास रखते हैं और इसीलिए मोदी इस बार भारत की सीमाओं को सुलगती रखने वाले चार मिथकों PoK, CoK, LoC और LAC को तोड़ कर एक नई अंतरराष्ट्रीय सीमा खींचने वाले हैं। कोई पीओके-सीओके नहीं, कोई एलओसी-एलएसी नहीं। सीधी-सीधी इंटरनेशनल बॉर्डर होगी चीन और पाकिस्तान के साथ।

मोदी ‘अगस्त क्रांति 2020’ में मिशन मिथक तोड़ो को पूरा करने की तैयारी कर चुके हैं, जिसमें चीन और पाकिस्तान के विरुद्ध एक साथ मोर्चा लेते हुए सबसे पहले भारत-पाकिस्तान नियंत्रण रेखा (एलओसी) को ध्वस्त कर पाकिस्तान को पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (पीओके) के उस तरफ खदेड़ा जाएगा। कश्मीर को अखंड बनाया जाएगा और पाकिस्तान को उसकी इंटरनेशनल बॉर्डर दिखा दी जाएगी। इस मिशन में चीन भी लपेटे में आने से नहीं बचेगा, जिसके पास कश्मीर का अक्साई चिन हिस्सा है। यह चीन अधिकृत कश्मीर (सीओके) कहलाता है। भारत जब अखंड कश्मीर के लिए लड़ेगा, तो पीओके के साथ-साथ पाकिस्तान द्वारा चीन को भेंट किए गए सीओके को भी वापस लेगा, तभी अखंड कश्मीर का निर्माण संभव है।

जब पीओके-सीओके-एलओसी के मिथक तोड़े जाएँगे, तो चीन द्वारा कपोल-कल्पित एवं भारत पर थोपी गई वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) की भी बारी आ ही जाएगी। भारत इस तथाकथित एलएसी के मिथक व कलंक को मिटा कर चीन के साथ भी स्पष्ट इंटरनेशनल बॉर्डर खींचेगा। मोदी के संबोधन से इसका स्पष्ट अनुमान लगाया जा सकता है कि प्रधानमंत्री अब चीन-पाकिस्तान का अंतिम व निर्णायक उपचार करने का निर्णय एवं संकल्प कर चुके हैं।

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