भारत पर कैसे लगे LAC-LoC जैसे ‘कलंक’, जिन्हें जड़ से मिटाने का यही है RIGHT TIME ?

0
240

58 वर्ष पहले चीनी PM झोउ एनलाई ने नेहरू को लिखे पत्र के ज़रिए थोपी LAC

73 वर्ष पहले नेहरू के पाकिस्तान से युद्ध विराम करने के कारण जन्मी LoC

नेहरू के किए-कराए पर नरसिंह राव ने फेरा पानी, जब भारत ने LAC मानी

जम्मू-कश्मीर से 370 हटाने के बाद अब 2 और ऐतिहासिक भूलें सुधारेंगे मोदी ?

चीन-पाकिस्तान का ‘स्थायी उपचार’ करके ही भारत को मिलेगी वास्तविक ‘शांति’

विशेष टिप्पणी : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद (2 जुलाई, 2020)। 15 अगस्त, 1947 को विभाजन की पीड़ा और खंड-खंड भूमि के टुकड़ों के रूप में स्वतंत्र हुआ भारत 73 वर्षों से जिस ‘सुख-शांति’ की कामना के साथ आगे बढ़ रहा है, वह उसे तब तक नहीं मिल सकते, जब तक कि चीन और पाकिस्तान का ‘स्थायी उपचार’ नहीं कर देता।

जिस दिन भारत स्वतंत्र हुआ, उस दिन भारत की भूमि सीमाएँ पाकिस्तान, अफग़ानिस्तान, चीन, नेपाल, भूटान तथा म्यानमार से जुड़ी हुई थीं, तो मालदीव और श्रीलंका के साथ समुद्री सीमाएँ जुड़ी हुई थीं। इस प्रकार 15 अगस्त, 1947 को भारत के भूमि-समुद्री सीमाओं से जुड़े कुल 8 राष्ट्र थे।

स्वतंत्रता प्राप्ति के दो महीने बाद ही पाकिस्तान ने कश्मीर पर आक्रमण कर दिया। 22 अक्टूबर, 1947 से प्रारंभ हुआ प्रथम भारत-पाकिस्तान युद्ध 14 महीनों बाद चरम् पर था। भारतीय सेनाएँ न केवल कश्मीर, अपितु पाकिस्तान की ओर भी तेज़ी से बढ़ रही थीं, तभी 31 दिसंबर, 1948 को रात 11.59 बजे तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने युद्ध विराम की घोषणा की, जो 1 जनवरी, 1949 से लागू हो गया।

नेहरू की नादानी से नासूर बनी LoC

इस युद्ध विराम के साथ ही भारत को एक पड़ोसी राज्य अफग़ानिस्तान से हाथ धोना पड़ा, क्योंकि उसकी ज़मीनी सरहद जिस भारत के कश्मीर में जिस हिस्से से जुड़ी हुई थी, वह नेहरू की युद्ध विराम की घोषणा के बाद पाकिस्तान के कब्ज़े में था। अधिकृत रूप से भले ही आज भी अफग़ानिस्तान हमारा पड़ोसी देश है, परंतु वास्तव में उसकी सीमाएँ हमारे देश से लगी हुई नहीं हैं। इस प्रकार 1 जनवरी, 1949 को भारत के पड़ोसियों की संख्या घट कर 7 रह गई।

इस युद्ध विराम के कारण कश्मीर के जितने हिस्से पर पाकिस्तानी सेना की उपस्थिति थी, वह हिस्सा पाकिस्तान के कब्ज़े में रह गया, जो आज पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) कहलाता है। इस युद्ध विराम के कारण ही अंतरराष्ट्रीय हस्तक्षेप चलते भारत की पाकिस्तान के साथ अंतरराष्ट्रीय सीमा केवल गुजरात, राजस्थान और पंजाब तक सिमट कर रह गई, जबकि कश्मीर से लगी सीमा को नियंत्रण रेखा (LoC) घोषित किया गया। यह एलओसी भारत और पीओके के बीच है। इस एलओसी का जन्म नेहरू की युद्ध विराम की घोषणा के कारण हुआ।

झोउ एनलाई ने थोपी LAC, नेहरू रहे अडिग

यह तो बात हुई 72-73 वर्ष पूर्व भारत ने ‘आ बैल मुझे मार’ वाली ढुलमुल नीति के कारण ख़ुद चल कर थुपवाई गई एलओसी की। अब बात करते हैं भारत-चीन के बीच बनी वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) की। भारत के सबसे पड़ोसी देश चीन के साथ स्वतंत्रता के साथ ही प्रारंभ हुए सीमा विवाद को चीन ने 58 वर्ष पहले बड़ी चालाकी से एलएसी का नाम दे दिया। 24 अक्टूबर, 1959 को तत्कालीन चीनी प्रधानमंत्री झोउ एनलाई ने भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को एक पत्र लिखा, जिसमें पहली बार एलएसी शब्द का प्रयोग किया।

7 नवंबर, 1959 को एनलाई ने नेहरू को एक और पत्र लिखा और इस पत्र के ज़रिये उन्होंने भारत पर काल्पनिक एलएसी थोपने का प्रयास किया, परंतु नेहरू तो 1954 में ही भारत का मानचित्र जारी कर चुके थे, जिसमें चीन के साथ जुड़ी विवादास्पद सीमाओं को ‘सर्वव्यापी’ बताया गया था अर्थात् उस नक़्शे में कोई स्पष्ट अंतरराष्ट्रीय सीमा नहीं दर्शाई गई थी।

भारत द्वारा 1954 को जारी किया गया नक़्शा ही भारत-चीन के बीच सीमा विवाद की जड़ बना। इस नक़्शे के जवाब में ही झोउ एनलाई ने काल्पनिक एलएसी बनाई और उसे भारत पर थोपने की कोशिश की, परंतु जब भारत ने उस एलएसी को मानने से इनकार कर दिया, तो यही इनकार भारत-चीन युद्ध 1962 का कारण बना।

नेहरू ने LAC को पहचानने तक से कर दिया इनकार

1962 में चीन के साथ बिना तैयारी के लड़े गए इस युद्ध में भारत को बुरी तरह पराजय का सामना करना पड़ा और चीन ने उस युद्ध के बाद 1959 में खींची गई काल्पनिक एलएसी को ही वास्तविक एलएसी दिया, जिसे नेहरू ने पहचानने तक से इनकार कर दिया। नेहरू झल्ला उठे और बोले, ‘‘चीनी लाइन में बीस किलोमीटर पीछे से हटने का कोई अर्थ या अर्थ नहीं है, जिसे वे ‘वास्तविक नियंत्रण की रेखा’ कहते हैं। यह क्या है ‘लाइन नियंत्रण ‘?’’

चीन से पराजय, चीन की शक्ति, चीन की आक्रामकता सहित कई ऐसे पहलू थे, जिनके चलते 31 वर्ष बाद भारत ने स्वयं को कमज़ोर मानते हुए 1993 में LAC शब्द को क़ानूनी मान्यता दे दी। तत्कालीन प्रधानमंत्री पी. वी. नरसिंह राव सरकार ने 1993 तथा 1996 में चीन के साथ दो समझौते किए, जिसके कारण एलएसी को लिखित रूप से मान्यता मिल गई।

नरसिंह राव सरकार ने की ऐतिहासिक भूल

यहीं पर भारत ने ऐतिहासिक भूल कर दी। जिस एलएसी को नेहरू ने मानने से इनकार कर दिया था, उसे राव सरकार ने मान्यता दे दी। इसके बावज़ूद भारत-चीन सीमा विवाद सुलझा नहीं और आज भी चीन के साथ भारत की अंतरराष्ट्रीय सीममा नहीं, बल्कि एलएसी है। दूसरी तरफ़ 21-24 वर्ष पूर्व हुए दोनों समझौतों का उल्लंघन करते हुए लगातार भारतीय ज़मीन हड़पने की कोशिश करता रहा, जिस पर 2014 में नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद लगाम कसी गई, तो चीन तिलमिला उठा।

अब ख़त्म हो ‘सी’ का खेल !

1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के बाद बांग्लादेश का उदय हुआ और भारत के पड़ोसियों की संख्या फिर से 8 हो गई। कुल मिला कर भारत के 8 में से 5 पड़ोसियों के साथ तो स्पष्ट ज़मीनी व समुद्री अंतरराष्ट्रीय सीमा है। मोदी सरकार ने म्यानमार तथा बांग्लादेश से जुड़ी अंतरराष्ट्रीय सीमाओं को पूरी तरह सुलझा लिया है, तो नेपाल के साथ ऐतिहासिक मित्रता होने के बावज़ूद थोड़ा सीमा विवाद है, परंतु वहाँ कोई ‘सी’ फैक्टर नहीं है। केवल चीन-पाकिस्तान से लगी सीमा पर ही यह फैक्ट है, परंतु अब पाकिस्तान के साथ एलओसी और चीन के साथ एलएसी सिरदर्द बन चुकी हैं। इस ‘सी’ फैक्टर को, इस नियंत्रण को, इस रेखा को अब समाप्त करने का समय आ गया है। भारत की आठों पड़ोसियों के साथ स्पष्ट अंतरराष्ट्रीय सीमा खींचने का समय आ गया है।

पक्का इलाज कर बनाई जाए इंटरनेशनल बॉर्डर

नरेन्द्र मोदी

आज जब चीन और पाकिस्तान दोनों मिल कर भारत को एक साथ चुनौती दे रहे हैं, तब अब समय आ गया है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार भारत को उसी अंदाज़ में एलएसी और एलओसी के ऐतिहासिक कलंक से मुक्त कराए, जिस प्रकार जम्मू-कश्मीर को धारा 370 तथा 35ए से मुक्त कराया।

यदि चीन पाकिस्तान के साथ मिल कर भारत को एक साथ दो मोर्चों पर युद्ध की चुनौती देने का दुस्साहस करने की सोच रहा हो, तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से तो माँ भारती की अपेक्षाएँ इससे भी अधिक हैं। लोग चाहते हैं कि मोदी के सशक्त नेतृत्व में तीनों सेनाओं के विराट पराक्रम के बल पर भारत एक ओर जहाँ चीन का स्थायी उपचार करे तथा एलएसी का कलंक मिटा कर स्पष्ट अंतरराष्ट्रीय सीमा खींचे, वहीं पाकिस्तान से पीओके वापस लेकर एलओसी का कलंक मिटाए और उसे असली अंतरराष्ट्रीय सीमा के उस पार धकेल दे।

विश्व भारत के साथ, फिर किसकी जोह रहे बाट ?

कोरोना वायरस फैलाने के आरोपों से घिरे चीन को दबोचने का यही सही समय है, क्योंकि पाकिस्तान-उत्तर कोरिया जैसे कुछ सनकी देशों को छोड़ कर पूरा विश्व चीन के विरुद्ध है। चीन के भारत के साथ सीमा विवाद पर भी अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी, जापान, फ्रांस, ऑस्ट्रेलिया सहित 150 से अधिक देश भारत के साथ हैं। यही सही समय है कि चीन का पक्का इलाज कर दिया जाए और भारत, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, उनकी सरकार, उनकी दृढ़ इच्छा शक्ति तथा भारतीय सेनाएँ ऐसा करने में सक्षम हैं। यहाँ तक कि चीन का पक्का यार रूस भी भारत-चीन विवाद में नहीं कूदेगा, क्योंकि रूस न केवल भारत का सच्चा मित्र है, वरन् वह भारत-चीन के बीच तटस्थ रहने के अपने रुख़ पर आज भी अडिग है। ऐसे में भारत को रूस से भले सहायता न मिले, लेकिन इस बात से बड़ी राहत अवश्य मिलेगी कि वह चीन का साथ नहीं देगा।

चीन यदि भारत को एलएसी के साथ-साथ एलओसी से भी घेर कर दोहरी चुनौती देने की सोच रहा है, तो अब भारत को निर्णायक युद्ध में उतर कर ये दोनों कलंक हमेशा-हमेशा के लिए मिटा देने चाहिए, क्योंकि एलएसी और एलओसी दोनों ही ऐतिहासिक भूल, काल्पनिक तथा अवास्तविक हैं, जिनके कारण भारत की हज़ारों वर्ग किलोमीटर ज़मीन चीन-पाकिस्तान के कब्ज़े में है।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here