जब ठान ली मोदी ने : इसको बना डाला ‘कुत्ता’, तो उसको बनाएँगे ‘सूअर ’?

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पहले आतंकवाद पर पाकिस्तान और इमरान को पूरे विश्व में किया हेय

अब विस्तारवाद पर चीन व जिनपिंग को पूरे विश्व में बनाएँगे अस्पृश्य

टिप्पणी : कन्हैया कोष्टी

अहदाबाद (4 जुलाई, 2020)। इतिहास साक्षी है। जब नरेन्द्र मोदी जो ठान लेते हैं, तो उसे करके दिखाते हैं। मोदी ने पहली 26 मई, 2014 को बार भारत के प्रधानमंत्री के रूप में कमान संभाली ली, तो दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन (दक्षेश-SAARC) देशों के राष्ट्राध्यक्षों को आमंत्रित किया, जिनमें पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ भी शामिल थे।

कल यानी 3 जुलाई, 2020 को ऐतिहासिक दिवस बनाते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अचानक लद्दाख पहुँच कर लेह के नीमू स्थित सैन्य मुख्यालय में जवानों को संबोधित करते हुए कहा, ‘शांति की पहल वही कर सकता है, जो शक्तिशाली होता है। निर्बल कभी शांति की पहल नहीं कर सकता।’

नरेन्द्र मोदी ने 26 मई, 2014 को अपने प्रथम शपथ ग्रहण समारोह में दक्षेश राष्ट्राध्यक्षों को आमंत्रित कर यही सिद्ध किया था कि भारत शक्तिशाली है। इसीलिए उसने उस दक्षेस के सदस्यों को आमंत्रित किया, जिनमें भारत के साथ निरंतर शत्रुता, कटुता व कुटिलतापूर्ण व्यवहार करने वाला पाकिस्तान भी शामिल था।

दुर्भाग्य से छह वर्ष पूर्व पाकिस्तान को भारत और मोदी की शक्तिशाली शांति की पहल समझ में नहीं आई, वरना पाकिस्तान मोदी के प्रधानमंत्री बनने तथा उनके प्रथम शपथ ग्रहण समारोह में शामिल होने के सौभाग्य से ज़रूर सबक लेता और 18 सितंबर, 2016 को वह हिमाक़त न करता, जिसका अंजाम वह नहीं जानता था।

जी हाँ ! 18 सितंबर, 2016 को पाकिस्तान समर्थित आतंकवादियों ने तत्कालीन जम्मू-कश्मीर के उड़ी में भारतीय सैन्य शिविर पर घात लगा कर आक्रमण किया और 23 जवानों को शहीद कर दिया। मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद पाकिस्तान की यह पहली भूल थी और इसके बाद भी वह मोदी को समझे बिना उलझता रहा, जिसका नतीज़ा यह है कि मोदी ने पूरी दुनिया में पाकिस्तान को अघोषित रूप से आतंकिस्तान घोषित करा दिया।

महासत्ता अमेरिका व रूस से लेकर हर छोटा-बड़ा देश आज पाकिस्तान पर भरोसा नहीं करता। नवाज़ शरीफ के कार्यकाल में उड़ी आतंकी हमला हुआ, तो इमरान ख़ान के कार्यकाल में 14 फरवरी, 2019 को पुलवामा आतंकवादी हमला हुआ।

मोदी के धैर्य का बांध तो उड़ी हमले के बाद ही टूट गया था, जिसके चलते उन्होंने एक तरफ विश्व में आतंकवाद के नाम पर पाकिस्तान को अलग-थलग करने की धारदार कूटनीतिक रणनीति अपनाई और दूसरी तरफ उड़ी का बदला सर्जिकल स्ट्राइक से तथा पुलवामा का बदला एयर स्ट्राइक से लिया।

जब मोदी ने ठान ली, तो दुनिया भर में आतंकिस्तान के रूप में बदनाम पाकिस्तान और उसके प्रधानमंत्री इमरान ख़ान की हालत आज उस कुत्ते जैसी हो गई, जो दर-ब-दर की ठोकरें खा रहा है। आतंकवाद को प्रश्रय देने वाले पाकिस्तान और उसके प्रधानमंत्री पर न तो कोई भरोसा करता है, न ही कोई उन्हें गंभीरता से लेता है।

चीन को छोड़ कर पाकिस्तान की इस दुनिया में कहीं पूछ नहीं है। चीन के अहसानों और भारी कर्ज़ में डूबा पाकिस्तान बर्बादी के कग़ार पर है। इमरान ख़ान की हालत गली के कुत्ते से भी बदतर है। आतंकवाद के नाम पर पाकिस्तान को अलग-थलग करने की मोदी की रणनीति इतनी धारदार सिद्ध हुई कि इमरान ख़ान की हालत उस कुत्ते जैसी हो गई, जिसे सभी हेय दृष्टि से देखते हैं। यह मोदी की ठान का नतीज़ा है।

अब नरेन्द्र मोदी ने जब चीन को ललकारा है, तो यह निश्चित रूप से मान कर चलिए कि चीन और उसके चिरायु राष्ट्रपति शी जिनपिंग के विरुद्ध मोदी के पास पूरा तथा पक्का मास्टरप्लान है। मोदी ने जब ठान ली है, तो यह तय मानिए कि विश्व में अब चीन और जिनपिंग की हालत उस सूअर जैसी होने वाली है, जिसे लोग अस्पृश्य समझते हैं।

जी हाँ ! जब मोदी ने ठान ली, तो पाकिस्तान और इमरान को पूरी दुनिया में हेय व हिक़ारत की दृष्टि देखे जाने लगे। अब मोदी ने फिर ठानी है। दुश्मन और चेहरा बदल गया है, परंतु मोदी नहीं बदले। जिस प्रकार मोदी ने उड़ी आतंकी हमले के बाद पाकिस्तान के विरुद्ध अंतरराष्ट्रीय ‘अलग-थलग’ अभियान छेड़ा था, उसी प्रकार अब मोदी ने अब चीन तथा जिनपिंग के विरुद्ध अंतरराष्ट्रीय स्तर ‘अस्पृश्यता’ अभियान छेड़ दिया है।

मोदी ने कल जब यह कहा कि विस्तारवाद का युग समाप्त हो गया है, तो समझ लीजिए कि वास्तव में विस्तारवाद के युग के विरुद्ध ही नहीं, वरन् अब भी उस युग में जी रहे चीन व जिनपिंग को पूरी दुनिया में अस्पृश्यता अभियान की रणभेरी बजा दी है। मोदी को जानने वालों को यह साफ-साफ दिखाई दे रहा है कि शीघ्र ही पूरे विश्व में चीन व जिनपिंग की हालत भी ‘सूअर’ जैसी होने वाली है, जिसे पूरी दुनिया अछूत मानेगी।

मोदी की मुहीम यहाँ तक रंग ला सकती है कि चीन के साथ मज़बूरी में मित्रता निभा रहे भारत के सच्चे व सदाबहार मित्र रूस एवं रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन भी एक दिन चीन विरोधी मोर्चे में भारत के साथ शामिल हो जाएँ, तो आश्चर्य मत कीजिएगा, क्योंकि मोदी है, तो मुमकिन है।

मोदी है, तो मुमकिन इसलिए है, क्योंकि मोदी विराट विज़न रखते हैं। यही कारण है कि कोरोना वायरस संक्रमण पर अमेरिका जब चीन के विरुद्ध मोर्चा खोले बैठा है, तब रूस ने चीन से यारी निभाई और उसके विरुद्ध एक शब्द नहीं बोला। यह डोनाल्ड ट्रम्प और पुतिन की आपसी विवशताएँ हो सकती हैं, परंतु बात जब मोदी की आती है, तो पुतिन न तो भारत को अनदेखा कर सकते हैं और न ही मोदी को।

पुतिन क्यों नहीं कर सकते ऐसा ? इसके पीछे भी मोदी की धारदार रणनीति है। कोरोना पर घिरे और रूस से जारी सहयोग के बीच चीन ने जब भारत के साथ सीमा विवाद खड़ा किया, तनाव को रक्तरंजित अवस्था तक ले गया, तब मोदी सरकार मॉस्को पहुँच गई। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने रूस के साथ बड़ी डील की। मोदी ने पुतिन से बात भी की।

मोदी की इस चाणक्य नीति का कोई तोड़ नहीं है और इसीलिए जब मोदी ने ठान ली है, तो इमरान की हालत कुत्ते जैसी होने के बाद जिनपिंग की हालत सूअर जैसी होना तय समझिए। वह दिन दूर नहीं, जब चीन विरोधी मोर्चे में पाकिस्तान को छोड़ कर पूरी दुनिया शामिल होगी। बेशक़ पाकिस्तान और इमरान नहीं होंगे, क्योंकि उनके विरुद्ध मोदी ने मोर्चा खोला था, तो चीन तथा जिनपिंग ने कायराना दोस्ताना निभाया था, तो ऐसे में चीनी बोझ से पहले ही दबे-कुचले इमरान कहाँ मोदी के चीन विरोधी मोर्चे में शामिल होने का साहस जुटा पाएँगे।