जब मोरारजी ने कहा, ‘मेरी लाश पर बनेगा गुजरात..’ तो गुजरातियों ने अपनी लाशें बिछा दीं…

0
610

19 अगस्त, 1956 को गुजरात में पहली बार लगा था ‘जनता कर्फ्यू’ !

आलेख : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद (1 मई, 2020)। गुजरात आज 60 वर्ष का हो गया। 15 अगस्त, 1947 को स्वतंत्रता के समय सौराष्ट्र तथा बॉम्बे स्टेट का हिस्सा रहे गुजरात की 6 वर्षों तक तो दूर-दूर तक किसी ने कल्पना नहीं की थी, परंतु 1953 के कांग्रेस अधिवेशन में जब देश में भाषा आधारित राज्यों के गठन का प्रस्ताव पारित हुआ, तभी गुजरातियों के मन में उनकी ‘अपना गुजरात’ की कल्पना का उदय हुआ। तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू, उनके मंत्रिमंडल तथा सरकार में उस समय एकमात्र गुजराती नेता मोरारजी देसाई की तूती बोलती थी। देसाई नेहरू मंत्रिमंडल में वित्त मंत्री जैसे बड़े पद पर थे। ऐसे में सौराष्ट्र-बॉम्बे राज्यों में रहने वाले गुजरातियों को पृथक गुजरात के गठन में सर्वाधिक सहायता व सहयोग की आशा देसाई से ही थी, परंतु देसाई की निजी महत्वाकांक्षाओं ने उन्हें गुजरातियों का शत्रु बना डाला।

वास्तव में जब गुजरातियों ने पृथक गुजरात की स्थापना की मांग की, तो गुजरातियों व मराठियों के बीच देश की आर्थिक राजधानी बॉम्बे (अब मुंबई) के लिए संघर्ष छिड़ गया। यद्यिप गुजरातियों को मुंबई से मोह नहीं था, परंतु मोरारजी देसाई यह मान कर चल रहे थे कि बॉम्बे के बिना गुजरात एक दिन भी नहीं चल सकेगा। मोरारजी देसाई ने यहाँ तक कहा दिया था, ‘मुंबई के बिना गुजरात का निर्माण मेरी लाश पर होगा।’ देसाई के मुंबई मोह ने पृथक गुजरात के गठन में विघ्न डाल दिया और वे गुजरातियों के लिए विलन बन गए, तो दूसरी तरफ मराठियों को भी लगा कि देसाई मुंबई को मराठियों से छीन कर गुजरातियों की झोली में डालना चाहते हैं, जबकि वास्तव में गुजरातियों को केवल पृथक गुजरात से मतलब था, न कि मुंबई से।

8 अगस्त, 1956 बना काला दिवस

बॉम्बे को लेकर मोरारजी तथा मराठियों के ममत्व ने पृथक गुजरात के गठन को विलंब में डाल दिया। विवाद को देखते हुए 7 अगस्त, 1956 को नेहरू मंत्रिमंडल ने मुंबई व महाराष्ट्र नामक दो राज्य बनाए जाने का प्रस्ताव स्वीकृत किया। इसमें गुजरात को मुंबई राज्य में शामिल रखा गया। इतना ही नहीं, वरन् मुंबई को द्विभाषी राज्य (गुजराती-मराठी) घोषित किया गया। यह समाचार सुनते ही गुजराती भड़क उठे। इस पर लोकसभा में अगले ही दिन 8 अगस्त, 1956 को महाराष्ट्र व गुजरात सहित द्विभाषी मुंबई राज्यों के गठन का प्रस्ताव पारित कर दिया। यह दिन गुजरात के लिए काला दिवस सिद्ध हुआ। इससे गुजरात में आक्रोश और भड़क उठा। गुजरातियों का आक्रोश नेहरू सरकार तथा अपने ही गुजराती नेता एवं केन्द्रीय मंत्री मोरारजी देसाई के विरुद्ध था। इतना ही नहीं, गुजरातियों ने मोरारजी देसाई के कथन के विपरीत पृथक गुजरात के लिए अपनी लाशें बिछा दीं।

अहमदाबाद सहित पूरा गुजरात सड़कों पर

पृथक गुजरात की मांग को लेकर अब गुजराती अपनी लड़ाई सड़क पर ले आए। इस आंदोलन का केन्द्रबिंदु था अहमदाबाद। अहमदाबाद में भद्र स्थित कांग्रेस हाउस में बड़ी संख्या में गुजराती विशेषकर विद्यार्थी इकट्ठा हो गए। कांग्रेस हाउस से गोलियाँ चलीं और 8 अगस्त, 1956 को ही 7 से 8 विद्यार्थी शहीद हो गए। 9 अगस्त तक अहमदाबाद से भड़की हिंसा पूरे गुजरात में फैल गई। गुजरात में चहुँओर नेहरू व मोरारजी के विरुद्ध भारी आक्रोश के बीच सरकारी संपत्तियों में तोड़फोड़ व आगजनी हुई और 10 छात्र शहीद हुए। 10 अगस्त को अहमदाबाद के कई क्षेत्रों में कर्फ्यू लगाना पड़ा।

मोरारजी को मुँहतोड़ जवाब

आज जब पूरे देश ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के आह्वान पर पहली बार 22 मार्च, 2020 को कोरोना (CORONA) विरोधी युद्ध में जनता कर्फ्यू देखा, परंतु गुजरात के लिए जनता कर्फ्यू कोई नया शब्द नहीं है। गुजरात प्राय: राज्य, समाज व जनता के हित में जनता कर्फ्यू का उपयोग करता रहा है। यही कारण है कि गुजरात के गठन में रोड़ा बन रहे मोरारजी देसाई के विरुद्ध भी गुजरातियों ने जनता कर्फ्यू नामक शस्त्र का ही उपयोग किया था। गुजरातियों के मन में यह बात घर कर गई थी कि मोरारजी देसाई के मुंबई मोह के कारण गुजराती भाषा की अस्मिता पर आधारित गुजरात राज्य का गठन नहीं हो पा रहा, परंतु मोरारजी अपनी बात पर अड़े रहे। उन्होंने गुजरातियों को समझाने के लिए 19 अगस्त, 1956 को अहमदाबाद में जनसभा की, तो आंदोलनकारियों ने जनता कर्फ्यू की घोषणा कर दी। कदाचित गुजरात के इतिहास में यह पहला जनता कर्फ्यू था। आंदोलनकारियों ने इंदूलाल याज्ञिक के नेतृत्व में उसी दिन समानांतर जनसभा आयोजित की। जनता कर्फ्यू इतना सफल रहा कि मोरारजी की सभा में कौए तक नहीं उड़ रहे थे, तो दूसरी तरफ याज्ञिक की सभा में गुजरातियों का सैलाब उमड़ पड़ा था।

इंदूलाल याज्ञिक ने संभाली कमान

अब तक बिखरी हुई अवस्था में चल रहा गुजरात की मांग के आंदोलन को 9 सितंबर, 1956 को अहमदाबाद में खाडिया स्थित औदिच्य की वाडी में आयोजित एक सभा में इंदूलाल याज्ञिक के रूप में नेतृत्व मिला। इस सभा में महागुजरात परिषद् का गठन किया गया और याज्ञिक के नेतृत्व में आंदोलन और तेज़ हो गया। आंदोलन की आग में गुजरात लगभग साढ़े तीन वर्षों तक झुलसता रहा और अंतत: मोरारजी देसाई को दरकिनार कर नेहरू सरकार ने 27 अगस्त, 1959 को लोकसभा में द्विभाषी मुंबई राज्य को भंग कर दो राज्यों गुजरात तथा महाराष्ट्र के गठन का प्रस्ताव पारित किया। प्रस्ताव के अनुसार मुंबई महाराष्ट्र के हिस्से में चला गया, परंतु गुजरातियों को इस बात का तनिक भी खेद नहीं था। प्रस्ताव के अनुसार 1 मई, 1960 को गुजरात की स्थापना हुई।