जागते हुए भी ‘सो’ रहे लोगों को झकझोर कर जगा रहा कोरोना, ‘यह करो ना, वह करोना…’

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आलेख : दर्शन मांकड, हिन्दी अनुवाद : राजेन्द्र निगम

अहमदाबाद (5 ममई, 2020)। आज जबकि दुनिया जीवन की एक और चुनौती से जूझ रही है, उस समय  मात्र एक ही चीज़ पर बार-बार ध्यान जा रहा है और वह है सिर्फ़ और सिर्फ़ जागृति का अभाव। दूसरे शब्दों में कह सकते हैं, ‘जीवन जीने की जागृति का अभाव’। एक छोटे से उदाहरण से शुरू करते हैं।

अगर हमारे घर में एक बच्चा जन्म लेता है, तो उससे जुड़ी चीज़ों पर यदि ध्यान नहीं दिया जाता है, तो वह आपसे अपेक्षा नहीं करना छोड़ देगा। कहने का तात्पर्य है कि अगर बच्चे को अहसास हो जाजाता है कि पापा उसे चॉकलेट नहीं दिलाएँगे, तो वह कभी पिताजी से चॉकलेट नहीं मांगेगा और तब वह अन्य मार्ग अपनाएगा। संक्षेप में कहेंकहें, एक छोटा-सासा बच्चा भी जागृति के बारे में पूरी तरह से जागरूक वव सतर्क होता है।

उपरोक्त मुद्दे को प्रस्तुत करना आवश्यक था। इसे आसानी से और सहज रूप से समझना भी उतना ही ज़रूरी था, क्योंकि वर्तमान में कोरोना वायरस (CORONA VIRUS) भारत सहित पूरी दुनिया में कोविड- 19 (COVID 19) नामक महामारी फैला रहा है और हज़ारों लोगों को अपनी गिरफ़्त में ले रहा है।

वायरस, यह कोई पहली बार सुना हुआ शब्द नहीं है, लेकिन उसके बाद भी इतनी भ्रामकता व अंधाधुंधी यदि फैली है, तो इसका कारण जागृति की भारी क़मी है।

यह सुना गया है कि मानव मूल्यों पर विदेशों में बहुत अच्छी तरह से ध्यान दिया जाता है, अर्थात यदि कोई व्यक्ति सड़क पर गिरता है, तो उसे तुरंत मौके पर मौजूद सरकारी प्रतिनिधियों द्वारा उठाया जाएगा और साथ ही यह भी उल्लेखनीय है कि यदि वह अस्पताल में भर्ती है, तो सरकार द्वारा सभी खर्चों का वहन कर उसकी उचित जाँच की जाएगी।

अब अगर इस तरह की सुंदर मज़ेदार व्यवस्था है, तो कोरोना जैसी महामारी को अमेरिका सहित विदेशी राष्ट्र क्यों और कैसे उसे परास्त करने में जी-जान से सफल नहीं हो पा रहे हैं ?

जीवन के हर चरण में ऐसे अनगिनत मुद्दे हैं, जो आपको कुछ सिखाने या समझाने के लिए ही आते हैं। जब उसे सहज रूप से यदि स्वीकार नहीं किया जाता है, तब वे किसी आपदा के रूप में हमारे सामने आते हैं। ऐसी परिस्थितियों में निरंतर जागृत रहना आवश्यक हो जाता है।

क्या भौतिकता की दौड़ में स्वयं का निरंतर भागते रहना ही जीवन है ? स्वयं के सत्य के मापदंड को प्राप्त करना आवश्यक नहीं है ? जिस प्रकृति में हमने एक जीवित प्राणी के रूप में पदार्पण किया, उस प्रकृति को हमने क्या प्रदान किया ? हमने क्या लौटाया और हमने क्या प्रतिफल दिया है ? उस संबंध में भी हममें जागृति का अभाव है और इस प्रकार का अभाव हमें नैसर्गिक आपदाओं का सामना करने के लिए मजबूर करता है, लेकिन दुःख है कि जीव ऐसी आपदाओं से कोई सीख लिए बग़ैर ही वह भौतिकवाद में और अधिक से अधिक स्थापित हो रहा है।

जीव। इस शब्द को हाल के दिनों में बहुत व्यापक रूप से पढ़ा होगा। इस शब्द का उपयोग कोरोना वायरस को संबंध में भी हुआ है, जैसे कि कोरोना वायरस लोहे पर इतने वक्त और प्लास्टिक पर इतने वक्त तक जीवंत रहते हैं। तो इसका मतलब हुआ है कि वायरस अर्थात एक प्रकार का जीव। ययद्यपि कोरोना कोई जीव नहीं, वरन् एक कण है, जिसका उपचार उसका विघटन करना ही है।

अब मैं आपको विषय की शुरुआत में ले जाता हूँ।  अब क्या आपको वह बच्चा याद है, जिसकी हमने ऊपर बात की थी ? किसी भी प्रकार का जीव हो, उसमें एक निश्चित प्रकार की कार्यशैली होती है और वह जीव उस तरह से काम करने के लिए आता है।

विशेष रूप से प्रत्येक जीव भावनाओं और संवेदनाओं की शक्ति से संपन्न होता है। इसलिए कह सकते हैं कि  भावनाओं और संवेदना शक्ति की हमारे पास जो समझ है, वह कम या ज्यादा अंश में इस जीव में भी होना चाहिए।

अगर हम कोरोना वायरस को एक जीव के रूप में ही लें, तो तीन कारण हैं, जिस वज़ह से कोरोना महामारी पैदा हुई। इसमें सही आहार न लेना, जैविक शस्त्रों के रूप में सही तरीके से इस्तेमाल न किया जाना और प्राकृतिक आपदा शामिल हो सकते हैं। उपरोक्त तीन कारणों में से, जागृति की कमी के बारे में जो अब तक बात की गई है, वह जागृति की कमी यहाँ एक उत्पत्ति केन्द्र के रूप में दिखाई दे रही है।

क्या खाएँ ? और क्या न खाएँ ? अगर इस बारे में जागृति की बड़ी क़मी हो, तो फिर किसी भी जीवन के भविष्य के बारे में निश्चित रूप से कुछ नहीं कहा जा सकता है। फिर भी, जो लोग तामसिक भोजन लेते हैं, तो उसके परिणाम व उससे उत्पन्न बीमारी लाइलाज है  और आज की आंतरिक आध्यात्मिकता के विपरीत, बाह्य भौतिकवादी जीवन में जीवन के मूल्यों की तिलांजलि यदि दी जाती है, तो उससे कोरोना जैसे संकट को आमंत्रित करना ही सिद्ध होता है।

जैविकशास्त्र। हाँ, यह भी भौतिकवाद का एक हिस्सा बन गया है और सभी देश इस बात से अनजान हैं कि वे एक दूसरे से आगे निकलने की दौड़ में क्या-क्या कर रहे हैं ? ऐसे में वे वायरस नामक जीवन के पोषण या उसके पनपने के लिए क्या करेंगे ? और अधिकांश देशों के लिए यह एक प्रतियोगिता नहीं है, बस एक डर है और तीसरा कारण है प्राकृतिक आपदा।

एक जीव को खाने में, लड़ाने में कितना उपयोग करना है, जब इसका एहसास नहीं होता है, तो निश्चित रूप से वह अपने मूल रूप में आकर अपनी अहमियत बताता है। यहाँ तीनों चरणों में जागृति की क़मी पर ध्यान दिया जा रहा है। जीवन जीने के प्रति जागृति की निरंतर क़मी ने आज पूरे विश्व को कोरोना के शिकंजे में ले लिया है।

ख़ैर, बात यहीं नहीं रुकती है और यह कहना मुश्किल है कि यह मूक जीव जब इतनी तेज़ी से फैल रहा था, कोई इसे जान ही नहीं सका, लेकिन जागरूकता की क़मी पूरी दुनिया में चारों ओर है और विदेशों में लोग एक-दूसरे की पश्चिमी संस्कृति को भूल कर ‘नमस्ते’ की भारतीय संस्कृति को अपना रहे हैं और उससे भारतीय उमंग में आ गए हैंहैं, लेकिन अब चुनौती है कि लॉकडाउन (LOCKDOWN) से बाहर निकल कर कितने नरबाँकुरे हाथ जोड़ कर नमस्ते करने की प्रणाली को आगे बढ़ाते हैं ?

दूसरी ओर, भौतिकवादी राष्ट्र, जिनमें एक-दूसरे पर प्रतिस्पर्धा में रहने की ख़राब आदत होती है, वे एक-दूसरे पर  आरोप लगाने लगे, लेकिन एक भी विशेषज्ञ इस मामले में किसी ठोस मुक़ाम तो पहुँचा हो, वैसा नहीं हुआ। हाँ, निश्चित रूप से कुछ हद तक आंशिक सफलताएँ मिलीं, लेकिन कमोबेश स्थिति वैसी ही है।

हालाँकि, भारत को यहाँ अलग तरह से देखा जा रहा है, लेकिन यह केवल लॉकडाउन घोषणा के त्वरित कार्यान्वयन के कारण है, ऐसा लोग मानते हैं और इससे इनकार भी नहीं किया जा सकता है।

सबसे पहले, भारत में एक दिवसीय जनता कर्फ्यू घोषित किया गया और तब लोगों की मानसिकता के अनुसार, स्थिति ऐसी थी, मानों एक दिन घर पर रह कर उन्होंने जंग जीत ली हो । फिर हमारी संस्कृति के अनुसार शाम 5 बजे ध्वनि-उपचार का माध्यम अपनाया गया, जिसे बहुत अच्छा प्रतिसाद मिला, लेकिन जो होना था, वह नहीं हुआ और एक बार फिर जागृति की क़मी देखने को मिली, जब अहमदाबाद में ही कुछ लोग सोशल डिस्टेंसिंग कीकी धज्जियाँ उड़ाते हुए झुंडों में सड़कों पर उतर ओए।

इसके बाद पहला लॉकडाउन का समय आया और यह शब्द विदेश से आया था, इसलिए लॉकडाउन की परिभाषा को समझते और समझाते आठ- दस दिन बीत गए और उस दौरान कुछ अच्छी-बुरी ख़बरें आती रहीं। कहीं पुलिस कर्मियों की मानवता, कहीं ड्यूटी पर मौज़ूद डॉक्टरों और नर्सों के सराहनीय कार्य, जगह-जगह सामाजिक संगठनों की मदद, लेकिन यह सब चल रहा था और जो अब भी निर्बाध गति से चल रहा है।

ऐसी स्थिति में अन्य राज्यों में फँसे कारीगरों, मजदूरों आदि को वे जहाँ भी थे, उन्हें रोक दिया गया, जिससे रोग अधिक नहीं फैले और तब संघर्ष के मामले सामने आने लगे।

लॉकडाउन की बात है, लेकिन यह परिभाषा शिक्षितों के लिए भी नई थी, तो आम आदमी को इसके बारे में कैसे मालूम होगा ? और न ही उउसे उसका अर्थ मालूम था। इसे भी जागरूकता की क़मी का एक नमूना कह सकते हैं।

लॉकडाउन में धारा 144 लगाई गई और सोशल डिस्टेंसिंग के उपाय, साबुन से हाथ धोना आदि सतर्कता निर्देश जारी हुए। इसके बावज़ूद रोगियों की जो संख्या करीब 500-600 थी, वह बढ़ कर अचानक हज़ारों पर पहुँच गई, जिसके लिए एक तबलीग़ी जमात के लोगों पर आरोप लगाए गए।

दूसरी ओर आज भी कई लोग ग्रीन ज़ोन में, मुँह पर रूमाल लगाए बिना घूमते हैं, थूकते रहते हैं और कुछ क्षेत्रों में पुलिस वाहनों को देखते ही लोगों के झुंड गली में चले जाते हैं और फिर तब ‘जैसे थे’ की स्थिति हो जाती है। तब ऐसा लगता है कि हम केवल एक शब्द को ही पहचानते और मानते हैं और वह शब्द है ‘कर्फ्यू‘। हालांकि कर्फ्यू में जीवन की आवश्यक वस्तुएँ नहीं मिलती हैं, लेकिन लोगों को एक जागृति के साथ घरों में बंद रखने के लिए यह शब्द सर्वविदित ववलवव सार्थक है।

अब बात करते हैं सोशल डिस्टेंसिंग की। इस संबंध में तो सोशल मीडिया पर भी इसकी जागृति के बारे में पूर्ण रूप से अभाव है। लोग सरकार की गतिविधियों को संदेह की नज़र से देखते हैं और सोशल मीडिया पर उस संबंध में गाली-गलौज… लेकिन बात यहीं नहीं रुकती है।

दान- धर्म में विश्वास करने वाले तो बस तसवीरों में आ जाते हैं। घरों में महिलाएँ समय बिताने के लिए हाउसी खेल रही हैं और कहीं अलग-अलग व्यंजन बनाए जा रहे हैं, जबकि हज़ारों मज़दूरों का पेट खाली है। इनमें  अपवाद हो सकते हैं, यदि इन व्यंजनों में कोई रचनात्मकता हो।

वैसे, रचनात्मकता में जागरूकता की क़मी दिखाई दी है और अगले तीन महीनों में हम लोगों की स्थिति क्या होगी?  इसकी आयोजना में सोशल मीडिया पर 50-100 लोग मिलने लगे। तब निश्चित रूप से लगने लगा कि ये लोग अपने जीवन के संबंध में कितने अंधेरे में हैं ?  जहाँ खुद को जगाने का समय आया है, जहाँ भविष्य के जीवन के प्रति जागृत होने की आवश्यकता है, वहाँ उसके स्थान पर व्यर्थ की चिंताओं के भँवर में फँसे हुए हैं ..!

यह तो हुई जागृति की क़मी की बात, लेकिन जहाँ वास्तव में जागृति, संयम और जागरूकता थी, वहाँ व्यक्तिगत रूप से कई अच्छे परिणाम प्राप्त हुए हैं। कितने ही लोग व्यसन-मुक्त हो गए, कितने ही घरों में लोग परस्पर आनंदित रहने लगे। कहीं ग़लतफहमी थी, तो दूर हो गई…  आदि, लेकिन यह सब तभी संभव है, यदि आप स्वयं के बारे में जागृत हैं।

ऐसी परिस्थितियों में भौतिक साधनों में ही सिर खपाने के स्थान पर स्वयं की ऊर्जा को बढ़ाने के प्रयास में लगातार काम करना चाहिए, क्योंकि किसी के साथ लगातार संपर्क के कारण ही किसी भी तरह का संक्रमण होता है। इसलिए ज़रूरत है किकि हम अपने सभी सभी कर्तव्यों को पूरा करते हुए, आंतरिक यात्रा करें और एकांत सेवन करें।

Read In Gujarati : કોરોના જેવો ‘જીવલેણ જીવ’ પણ આ રીતે આપી રહ્યો જીવન જીવવાનો સંદેશ