इतिहास साक्षी है : तो धीरे-धीरे CURFEW की ओर बढ़ रहा है अहमदाबाद ?

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लौटने वाले हैं ‘सड़कों पर सन्नाटा, जवानों का पहरा, फ्लैग मार्च’?

कर्फ्यू के ‘आदी’ AMDAVADI कर्फ्यू से कम में नहीं मानेंगे ?

लॉकडाउन की लग़ाम को नहीं किया प्रणाम, अब हो जाइए तैयार…

सात दिन में नहीं सुधरे, तो क्या कर्फ्यू ही होगा ‘ब्रह्मास्त्र’ ?

नहीं बने ‘होशवाले’, तो हो जाओगे ARMY के हवाले

विश्लेषण : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद (6 मई, 2020)। इतिहास के विषय में प्राय: कहा जाता है, ‘इतिहास अपने आपको दोहराता है…’। कुछ ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न हुई हैं भारत के बड़े महानगरों में से एक तथा गुजरात (GUJARAT) की आर्थिक राजधानी अहमदाबाद में। अहमदाबाद में वैश्विक महामारी कोविड 19 पर नियंत्रण हेतु किए जा रहे लक्ष्यावधि प्रयासों के पश्चात् भी निरंतर कोरोना संक्रमितों की संख्या दिन-प्रतिदिन तीव्र गति से बढ़ रही है।

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प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी (NARENDRA MODI) द्वारा गत 25 मार्च से क्रियान्वित किए गए राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन के पश्चात् भी मोदी के गृह राज्य गुजरात में विशेष रूप से आर्थिक राजधानी अहमदाबाद में कोरोना संक्रमण नियंत्रण में नहीं आ पा रहा था। यही कारण है कि गुजरात सरकार एवं अहमदाबाद महानगर पालिका (AMC) को आज से 7 दिनों के लिए इस महानगर को शटडाउन में डालने का कड़ा निर्णय करना पड़ा, जिसके तहत अहमदाबाद में 21 मई तक केवल दूध एवं दवाई की दुकानें ही खुली रहेंगी। सब्जी-राशन सहित आवश्यक सेवाओं में आने वाली सभी सामग्रियों की बिक्री पर रोक रहेगी।

‘अंधाधुंध’ अहमदाबादियों ने उड़ाई सोशल डिस्टेंसिंग की धज्जियाँ

अहमदाबाद मनपा आयुक्त विजय नेहरा के सेल्फ क्वॉरंटाइन होने के पश्चात् उनका पदभार संभाल रहे मुकेश कुमार ने बुधवार देर सायं जैसे ही अहमदाबाद(AHMEDABAD) में 7 दिनों के शटडाउन की घोषणा की, तो अहमदाबादियों में अफरा-तफरी मच गई। इस महानगर के लोग यह भूल गए कि लड़ाई प्राणघातक कोरोना (CORONA) के विरुद्ध है, जिसमें सोशल डिस्टेंसिंग सबसे महत्वपूर्ण है, परंतु शटडाउन की घोषणा के साथ ही अहमदाबाद के बाज़ारों में भीड़ उमड़ पड़ी और सोशल डिस्टेंसिंग की ऐसी धज्जियाँ उड़ीं, जो शिक्षित माने जाने वाले शहरी लोगों के लिए शर्मनाक थी।

लॉकडाउन में भी अनलॉक रहे अहमदाबादी शटडाउन से समझेंगे ?

अहमदाबाद आज से 7 दिनों के लिए शटडाउन हो गया है, परंतु इसका उत्तरदायी कौन है ? क्या कोरोना संक्रमितों के बीच 40 दिनों से कार्य करते हुए सेल्फ क्वॉरंटाइन (SELF QUARANTINE) की स्थिति में पहुँच चुके विजय नेहरा हैं ? वास्तव में अहमदाबाद (AHMEDABAD) को शटडाउन तक की स्थिति में पहुँचाने के लिए उत्तरदायी हैं वे लोग, जो लॉकडाउन में भी अनलॉक रहे।

घर में रहने की जगह सड़कों पर सकारण कम, अकारण अधिक निकले। सब्ज़ी व किराना वाले कोरोना के सुपर स्प्रेडर बने। यही कारण है कि 42 दिनों के लॉकडाउन के पश्चात् भी अहमदाबाद में कोरोना संक्रमितों की संख्या 6 मई तक 4,716 पर पहुँच गई।

पूरे गुजरात में यदि कोरोना संक्रमितों का आँकड़ा 6,625 तक ऊँचा है, तो इसका कारण अहमदाबाद व अहमदाबादी हैं। ऐसे में प्रश्न यह उठता है कि जिन अहमदाबादियों (AMDAVADIS) ने लॉकडाउन को प्रणाम नहीं किया, वे शटडाउन से समझ जाएँगे ?

घटनाएँ और तसवीरें कर रहीं कर्फ्यू की भविष्यवाणी

अब पुन: इतिहास पर ही लौटते हैं। अहमदाबाद का इतिहास कहता है कि जब-जब यहाँ के निवासी अनियंत्रित हुए, तब-तब उन्हें नियंत्रित करने के लिए राज्य शासन एवं पुलिस प्रशासन ने ढेरों उपायों के बीच अंतिम उपाय पर पहुँचने में विलंब नहीं किया। जी हाँ ! अंतिम उपाय यानी कर्फ्यू (CURFEW)।

1946 से लेकर 2002 तक अहमदाबाद की कई अच्छी पहचानों में एक बुरी पहचान प्राय: लग जाने वाला कर्फ्यू भी थी। अहमदाबाद की ऐतिहासिक जगन्नाथ रथयात्रा 1946 से लेकर महागुजरात आंदोलन, 1969 के दंगे, 1975 के नवनिर्माण आंदोलन (रोटी रमखाण), 1985 के आरक्षण विरोधी आंदोलन, 1990-92 के राम मंदिर आंदोलन तथा 2002 के गोधरा कांड उपरांत के दंगे।

हर बार मुद्दा साम्प्रदायिक या हिन्दू-मुसलमानों के बीच का झगड़ा नहीं था, परंतु अनियंत्रित अहमदाबादियों को नियंत्रित करने के लिए प्रशासन ने लाठीचार्ज, आँसू गैस के गोलों, कॉम्बिंग जैसे शस्त्रों के विफल रहने के बाद कर्फ्यू का ही ब्रह्मास्त्र के रूप में उपयोग किया।

ऐसे में लॉकडाउन (LOCKDWON) के 42 दिनों और शटडाउन से कुछ घण्टे पूर्व की जो घटनाएँ एवं तसवीरें हैं, वे यही भविष्यवाणी कर रही हैं कि तीन-तीन महीनों तक कर्फ्यू झेलने में सक्षम अहमदाबादी कर्फ्यू के आदी हैं और कोरोना विरोधी युद्ध में भी शासन-प्रशासन को अहमदाबाद में अंतत: कर्फ्यू नामक ब्रह्मास्त्र का ही उपयोग करने पर विवश होना पड़ेगा।

हम नहीं सुधरे, तो इतिहास स्वयं को दोहराएगा

अब अहमदाबाद के लोगों के पास 7 दिनों का समय है। इन सात दिनों में यदि अमहादाबादियों ने स्वयं को नहीं सुधारा, स्वयं को घरों में रखना नहीं सीखा, तो इतिहास स्वयं को दोहराने की प्रतीक्षा ही किए बैठा है। अपने 7 दशकों के कर्फ्यू इतिहास में अहमदाबाद के लोगों ने सैंकड़ों बार सड़कों पर सन्नाटा, पुलिस तथा कई बार सेना के जवानों का कड़ा पहरा, सेना का फ्लैग मार्च तथा देखते ही गोली मार देने के आदेश… जैसी स्थितियाँ देखी हैं।

यदि लॉकडाउन की लग़ाम से क़ाबू में नहीं रहे अहमदाबादी शटडाउन (SHUTDOWN) को सलाम नहीं करेंगे, तो यह निश्चित भविष्य दिखाई दे रहा है कि अहमदाबाद के एक बड़े भूभाग को कड़े प्रतिबंधों व पहरों वाले कर्फ्यू का सामना करना होगा। उस कर्फ्यू का, जिसमें दूध और दवाई भी नहीं मिलेगी। इतना ही नहीं, सड़क परिवहन पूर्णत: प्रतिबंधित होगा।

कुल मिला कर कर्फ्यू यानी पूर्ण गृहबंदी। सड़कों पर केवल सन्नाटा एवं जगह-जगह सुरक्षा कर्मियों की चौकसी ही दिखाई देगी। इन 7 दिनों में यदि कोरोना संक्रमण के मामलों में कमी नहीं आई या मामलों में हो रही बेतहाशा वृद्धि पर रोक नहीं लगी, तो संभव है कि राज्य सरकार व पुलिस प्रशासन अहमदाबाद को सेना (ARMY) के हवाले करने पर विवश हो जाए, जैसा कि इतिहास में कई बार हुआ है।

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