क्या है ‘मच्छू 79’, जिसका ‘पाठ’ मोदी को ‘कोविड 19’ में दिखा रहा है ‘PATH’, तो रूपाणी के लिए भी बना ‘ROAD’ ?

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आलेख : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद (20 मई, 2020)। संपूर्ण राष्ट्र अर्थात् माँ भारती इस समय भयावह वैश्विक महामारी कोविड 19 (COVID 19) के चक्रव्यूह में है। संकट की इस घड़ी में देश व गुजरात का नेतृत्व दो ऐसे व्यक्तियों के हाथों में है, जिन्होंने 4 दशक पूर्व गुजरात पर आई भीषण आपत्ति को न केवल देखा था, वरन् उस आपत्ति के दौरान किसी भी संवैधानिक पद पर न होते हुए भी पीड़ितों की जी-जान से सेवा की थी।

जी हाँ ! हम जिन दो व्यक्तियों की बात कर रहे हैं, वे हैं देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी तथा गुजरात के मुख्यमंत्री विजय रूपाणी तथा जिस भीषण आपत्ति की बात कर रहे हैं, वह है मोरबी की मच्छू बांध दुर्घटना 1979 की। गुजरात व भारत का यह सौभाग्य है कि आज जब राष्ट्रव्यापी महामारी कोरोना (CORONA) ने 6.50 करोड़ गुजरातियों सहित 130 करोड़ भारतीयों के प्राण संकट में डाल दिए हैं, तब 41 वर्ष पूर्व हुई मोरबी मच्छू बांध त्रासदी के साक्षी रहे मोदी देश व रूपाणी गुजरात का नेतृत्व कर रहे हैं।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और मुख्यमंत्री विजय रूपाणी, दोनों के लिए 4 दशक पुराना ‘मच्छू 79’ के दौरान सीखा गया पाठ ‘कोविड 19’ के विरुद्ध पथ प्रदर्शक बन रहा है। मोदी व रूपाणी दोनों ही मच्छू बांध त्रासदी के न केवल साक्षी हैं, अपितु दोनों ने इस भीषण विभीषिका में प्राणों को दाँव पर लगा कर पीड़ितों की सेवा की थी।

आज मच्छू बांध त्रासदी का अनायास ही स्मरण नहीं हो आया। इसका कारण हैं गुजरात के मुख्यमंत्री विजय रूपाणी। रूपाणी ने कोरोना संकट काल के दौरान कई मीडिया को साक्षात्कार दिया है और हर इंटरव्यू में उन्होंने मच्छू बांध त्रासदी का उल्लेख विशेष रूप से किया है। विजय रूपाणी ने 17 मई मंगलवार को रूपाणी ने को एक और लेटेस्ट इंटरव्यू में भी पुन: मच्छू 79 का उल्लेख किया।

रूपाणी ने हर इंटरव्यू की भाँति इस इंटरव्यू में भी इस बात को दोहराया कि गुजरात को तथा उन्हें आपदाओं से निपटना व आपदाओं को अवसर में बदलना भली-भाँति आता है, क्योंकि वे मच्छू बांध त्रासदी को साक्षात् देख चुके हैं। रूपाणी ने कहा कि 1979 में घटी मच्छू बांध त्रासदी से सीखा आपदा प्रबंधन का पाठ आज कोविड 19 का सामना करते हुए भी उन्हें राह दिखा रहा है।

क्या है मच्छू व बांध त्रासदी ?

आइए सबसे पहले आपको बताते हैं कि अंतत: यह मच्छू है क्या ? मच्छू गुजरात में बहने वाली एक नदी का नाम है। सौराष्ट्र में मोरबी, सुरेन्द्रनगर व राजकोट जिलों में बहने वाली मच्छू की लंबाई 130 किलोमीटर है। नदी का अधिकांश पथ मोरबी जिले से व्यतीत होता है। इसका उत्पत्ति स्थान जसदण तहसील के दहींसरा गाँव के पास है।

मच्छू नदी राजकोट तहसील, वाँकानेर तहसील, मोरबी तहसील, माळिया मियाणा तहसील के हंजियासर गाँव से होते हुए कच्छ के छोटे रण में विराम को प्राप्त करती है। मच्छू नदी पर मच्छू 1 तथा मच्छू 2 बांध बने हुए हैं। मच्छू 1 वाँकानेर के ऊपरी हिस्से में है, जबकि मच्छू 2 मोरबी के जोधपुर नदी गाँव के पास है।

क्यों मच्छू नाम पड़ा इस नदी का ?

आप सोच रहे होंगे कि इस नदी का नाम मच्छू क्यों एवं कैसे पड़ा ? इसका उत्तर है पौराणिक तथ्यों में। एक बार भगवान शिव यानी महादेव क्षीर सागर के तट पर पार्वतीजी को महत्वपूर्ण उपदेश दे रहे थे। उनके निकट ही एक मगरमच्छ था, जिसने कुछ समय पूर्व ही एक व्यक्ति को लील लिया था। शिवजी का पार्वती को दिया जा रहा उपदेश सुन कर मगरमच्छ के पेट से वह व्यक्ति बाहर आया और ज्ञानी पुरुष बना।

मगरमच्छ के पेट से दूसरा जन्म पाने वाला यह व्यक्ति मत्स्येन्द्रनाथ के रूप में प्रसिद्ध हुआ, जिन्होंने कालांतर में हठयोगी के रूप में ख्याति प्राप्त की। मत्स्येन्द्रनाथ ने ‘हठयोग प्रदीपिका’ नामक ग्रंथ भी लिखा। यद्यपि बाद में मत्स्येन्द्रनाथ अपने दो पुत्रों के प्रति अति आसक्त हुए।

इस कारण मत्स्येन्द्रनाथ के एक गौरवशाली शिष्य गोरखनाथ ने गुरु मत्स्येन्द्रनाथ के दोनों पुत्रों को एक नदी के तट पर मार डाला। इन दोनों पुत्रों को मत्स्य योनि प्राप्त हुई यानी मछली बन गए। इसी मत्स्य या मच्छ के नाम पर इस नदी का नाम मच्छू पड़ा।

मोदी-रूपाणी को सिखाया आपदा प्रबंधन का पाठ

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने लंबे सांगठनिक, सामाजिक व राजनीतिक जीवन में सबसे पहली जिस आपदा का सामना किया था, वह 1979 में आई थी, जब सौराष्ट्र विशेष रूप से मच्छू नदी के ऊपरी हिस्सों में भारी वर्षा के चलते मच्छू नदी में बाढ़ आई थी। 11 अगस्त, 1979 को मच्छू नदी पर बना मच्छू 2 बांध का जल स्तर तीव्र गति से बढ़ा।

जल की धारा इतनी घातक थी कि दोपहर 3.30 बजे मच्छू 2 बांध टूट गया और बांध के पानी ने पूरे मोरबी नगर में प्रलय ला दी। हज़ारों लोगों की मृत्यु हुई। मोरबी नगर पूर्णत: डूब गया। बसा-बसाया नगर नष्ट हो गया। इसके बाद आरंभ हुआ मृत मानवों व पशुओं मृतकों के शवों को उठाने से लेकर बचे हुओं की सेवा का यज्ञ।

इस कार्य में सबसे पहले पहुँचा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संगठन (Rashtriy Swayamsevak Sangh) अर्थात् RSS-आरएसएस। संघ के हज़ारों स्वयंसेवक मोरबी पहुँच गए, जिनमें नरेन्द्र मोदी व विजय रूपाणी भी थे। दोनों संघ के स्वयंसेवक थे या जनसंघ के कार्यकर्ता मात्र थे। उनके पास कोई संवैधानिक पद नहीं था और न ही संघ या संगठन में कोई ऊँचा पद था।

मोदी-रूपाणी दोनों ने मच्छू बांध त्रासदी की विभीषिका को आँखों से देखा तथा सेवा यज्ञ करते हुए किसी भी प्रकार की आपदाओं से निपटने के गुर भी सीखे, जिसे आज आपदा प्रबंधन कहा जाता है। यही आपदा प्रबंधन का गुर आज मोदी व रूपाणी दोनों को मार्ग दिखा रहा है।