यह हैं माहिष्मती के महाबाहुबली : राम से पूर्व अवतरित परशुराम आज भी क्यों जीवित हैं ?

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* जान लें जामदग्न्य को : ‘क्षत्रिय हंता’ नहीं थे ‘आवेशावतार’ भगवान परशुराम

* जान लें जामदग्न्य को : अनेक महान कार्यों के लिए अवतरित हुए थे परशुरा

जान लें जामदग्न्य को : वेद विरोधियों के सबसे बड़े शत्रु थे भगवान परशुराम

जान लें जामदग्न्य को : एक बाण से किया केरल से गुजरात तक समुद्र को पीछे धकेला

जान लें जामदग्न्य को : भारत में अधिकांश गाँवों के निर्माता थे भगवान परशुराम

जान लें जामदग्न्य को : विष्णु के सभी अवतार अंतर्ध्यान, पर परशुराम का कार्य शेष

जान लें जामदग्न्य को : कलियुग में विष्णु के कल्कि अवतार के गुरु बनेंगे परशुराम

मंथन : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद (25 अप्रैल, 2020)। जब भी परशुराम की बात आती है, याद आती है, तो सर्वसाधारण के मुख से परशुराम की वीरता की प्रसन्नता में एक ही वाक्य निकलता है कि परशुराम ने 21 बार इस धरती को क्षत्रिय विहीन किया था। आज हम सर्वसाधारण की इस सर्वसाधारण मान्यता में एक स्पष्टीकरण जोड़ना चाहते हैं। जिस प्रकार आधुनिक भारत में तुच्छ राजनीति करने वालों ने संविधान निर्माता व महापुरुष डॉ. बाबासाहब अंबेडकर को ‘दलित नेता, दलितोद्धारक’ जैसी सीमाओं में बांध दिया तथा उनके सर्वसमावेशी, भेदभाव रहित, समाजिक रूप से उन्नत भारत के निर्माण के प्रयासों को भुला दिया गया, उसी प्रकार नारायण विष्णु के 15वें मुख्य अवतार वामन के पश्चात् तथा 21वें मुख्य अवतार राम से पूर्व हुए 18वें अवतार परशुराम को भी आधुनिक भारत में सामाजिक व जातिगत राजनीति करने वालों तथा अर्धज्ञानियों ने केवल ‘क्षत्रिय संहारक’ के रूप में स्थापित करके उनके अनेक महान कार्यों को विस्मृत कर दिया गया।

भगवान परशुराम जयंती के अवसर पर आज हम उनसे जुड़े कई महान रहस्यों तथा महान कार्यों से अवगत कराने जा रहे हैं। भगवान परशुराम ने ब्राह्मण कुल में जन्म लिया था। वे भगवान विष्णु के आवेशावतार (क्रुद्ध) अवतार थे। हमारे महान पौराणिक साक्ष्यों व प्रमाणों के अनुसार भगवान विष्णु ने जब-जब पृथ्वी पर अधर्म बढ़ा, तब-तब अवतार धारण किया। विष्णु के अब तक हुए 23 अवतारों में 20 अंशावतार थे, जबकि राम व कृष्ण पूर्णावतार थे। अब बचे परशुराम, तो आपको जान कर आश्चर्य होगा कि विष्णु का परशुराम अवतार दीर्घावतार है, जिसने त्रेता युग में जन्म लिया। भगवान परशुराम का क्रोध इतना विकराल था कि उन्होंने सीता स्वयंवर में उनका शिव प्रदत्त धनुष तोड़ने वाले अपने ही स्वरूप भगवान राम को मिथिला नरेश जनक की भरी सभा में ललकारा था। यद्यपि बाद में वे राम के नारायण स्वरूप को पहचान गए और शांत होकर लौट गए। परशुराम इससे पूर्व त्रेता में ही हैहयवंशी क्षत्रियों का विनाश किया, तो द्वापर युग में सर्वप्रथम गंगा पुत्र भीष्म से युद्ध किया। बाद में भीष्म, आचार्य द्रोण तथा कर्ण को शस्त्र विद्या प्रदान की।

परशुराम थे माहिष्मती के महाबाहुबली

आधुनिक पीढ़ी फिल्म ‘बाहुबली’ से अच्छी तरह परिचित व प्रभावित है। ‘बाहुबली’ ही नहीं, वरन् ‘बाहुबली 2’ भी अत्यंत सफल फिल्म रही, परंतु बहुत कम लोगों को यह मालूम होगा कि फिल्म ‘बाहुबली’ में भले ही काल्पनिक ‘माहिष्मती’ साम्राज्य की कथा दर्शाई गई हो, परंतु हमारे महान भारत में वास्तव में कभी ‘माहिष्मती’ नामक साम्राज्य था। आज यह माहिष्मती महेश्वर नामक छोटे से नगर के रूप में सिमट गया है, जो मध्य प्रदेश में इंदौर के निकट स्थित है, परंतु इस नगर में आज भी ऐतिहासिक होल्कर वंश का दुर्ग विद्यमान है। नर्मदा तट पर बसा वर्तमान महेश्वर पौराणिक काल में माहिष्मती साम्राज्य था और इस साम्राज्य के सम्राट थे सहस्त्रार्जुन। क्षत्रिय कुल के हैहय वंशाधिपति सहस्त्रार्जुन का मूल नाम कार्त्तवीर्य अर्जुन था, परंतु उन्होंने भगवान दत्तात्रेय की घोर तपस्या कर उन्हें प्रसन्न किया और सहस्त्र भुजाएँ तथा युद्ध में किसी से भी परास्त न होने का वर पाया। दत्तात्रेय दत्त अपार शक्ति ने सहस्त्र भुजाओं वाले कार्त्तवीर्य अर्जुन को अहंकारी बना दिया। इस अहंकार ने सहस्त्रार्जुन को अपने ‘काल’ के पास पहुँचा दिया। हुआ यों कि माहिष्मती सम्राट सहस्त्रार्जुन आखेट करते-करते इंदौर जिला में ग्राम मानपुर के जानापाव पर्वत पर स्थित जमदग्नि मुनि के आश्रम में जा पहुँचा। जमदग्नि मुनि को देवराज इंद्र ने कपिला कामधेनु प्रदान की थी। कार्त्तवीर्य अर्जुन यानी सहस्त्रार्जुन के मन में कामधेनु प्राप्ति की लालसा जागी और वह जमदग्नि मुनि से बलपूर्वक कामधेनु छीन कर ले गया। जब सहस्त्रार्जुन का अहंकार सातवें आसमान पर था, तब भगवान परशुराम जमदग्नि व रेणुका के पुत्र के रूप में अवतार ले चुके थे। जमदग्नि व रेणुका ने तो इस बालक का नाम राम रखा था, परंतु राम ने भगवान शिव की कठोर तपस्या कर उनसे दिव्यास्त्र के रूप में परशु (फरसा) प्राप्त किया। इसीलिए जमदग्नि पुत्र जामदग्न्य के साथ-साथ परशुराम कहलाए। जब परशुराम को सहस्त्रार्जुन की करतूत का पता चला, तो वे कुपित हो उठे। परशुराम ने माहिष्मती साम्राज्य व सम्राट कार्त्तवीर्य अर्जुन पर आक्रमण कर दिया तथा शिव प्रदत्त दिव्यास्त्र परशु से सहस्त्रार्जुन की सभी भुजाएँ काट डालीं व सिर को धड़ से अलग कर दिया। सहस्त्रार्जुन के पुत्रों ने प्रतिशोध स्वरूप परशुराम की अनुपस्थिति में उनके ध्यानमग्न पिता जमदग्नि की हत्या कर दी। पति की मृत्यु पर पत्नी रेणुका भी सती हो गईं। इस कांड से क्रुद्ध परशुराम ने पूर्ण आवेग से माहिष्मती नगरी पर धावा बोल दिया और उस पर अपना आधिपत्य कर लिया। इतना ही नहीं, परशुराम ने पिता की हत्या के प्रतिशोध में हैहयवंशी क्षत्रियों का 21 बार समूह विनाश किया। अंतत: महर्षि ऋचीक ने परशुराम को शांत किया। परशुराम ने बाद में अश्वमेघ महायज्ञ कर सप्तद्वीप युक्त पृथ्वी महर्षि कश्यप को दान कर दी, अपने शस्त्र इंद्र के समक्ष समर्पित कर दिए तथा सागर द्वारा उच्छिष्ट भूभाग महेन्द्र पर्वत पर आश्रम बना कर रहने लगे।

परशुराम के इन महान कल्याणकारी कार्यों को नहीं जानते होंगे आप

हर वर्ष परशुराम जयंती पर केवल उनके क्षत्रिय हंता होने की कथाएँ पढ़ने वालों को यह नहीं पता होगा कि भगवान विष्णु ने परशुराम रूपी दीर्घकालीन अवतार ने अनेक कल्याणकारी कार्य किए थे। त्रेता युग में अवतरित परशुराम का उल्लेख रामायण, महाभारत, भागवत पुराण और कल्कि पुराण में भी मिलता है। परशुराम धरती पर वैदिक संस्कृति का प्रचार-प्रसार करना चाहते थे। वेद विरोधियों के परम् शत्रु परशुराम ने एक बाण से केरल से लेकर गुजरात तक स्थित समुद्र को पीछे धकेल दिया और नई भूमि का निर्माण किया। इसी कारण केरल से लेकर गुजरात तट पर स्थित क्षेत्रों में आज भी परशुराम अति वंदनीय व पूजनीय हैं। भारत आज गाँवों का देश है, तो यह भी परशुराम की ही देन है। भगवान परशुराम ने ही भारत में अधिकांश गाँव बसाए। परशुराम शस्त्र विद्या में निपुण थे, परंतु क्षत्रियों को विद्या दान निषिद्ध कर रखा था। वे सैन्य शिक्षा केवल ब्राह्मणों को ही देते थे। यद्यपि परशुराम ने भीष्म, द्रोण व कर्ण को शस्त्र विद्या दी। इनमें उन्होंने कर्ण को दी गई शस्त्र शिक्षा को शापित कर दिया, ‘जब इस शिक्षा की तुझे आवश्यकता होगी, तब तू इसे भूल जाएगा।’ कर्ण निरपराध था। वह स्वयं नहीं जानता था कि वह क्षत्रिय है, परंतु परशुराम उसे पहचान गए थे। इसीलिए परशुराम ने एक लीला के रूप में ही कर्ण को श्राप दिया, जिससे अर्जुन को सुरक्षित किया जा सके।

आज भी जीवित हैं परशुराम, पर क्योंकि विष्णु के अंतिम अवतार को देनी है शस्त्र विद्या

परशुराम त्रेता युग में भगवान राम से पहले अवतरित हुए थे। भगवान विष्णु के अब तक हुए 23 में से 22 अवतार अवतरण का उद्देश्य पूर्ण कर अंतर्ध्यान हो गए, परंतु परशुराम आज भी जीवित हैं। प्रश्न उठता है, ‘क्यों ?’ जमदग्नि के इस पुत्र को दादा महर्षि भृगु ने राम नाम दिया था। जमदग्नि पुत्र होने के कारण वे जामदग्न्य भी कहलाए, परंतु भगवान शिव की कठोर तपस्या करने पर उन्होंने जो परशु प्राप्त किया, उसके कारण वे परशुराम कहलाए। इस परशु का नाम था विद्युदभि। इसके पश्चात् परशुराम ने महर्षि विश्वामित्र व ऋचीक से शांर्ग नामक दिव्य वैष्ण धनुष तथा ब्रह्मर्षि कश्यप से अविनाशी वैष्णव मंत्र प्राप्त किया। शिवजी ने परशुराम को श्री कृष्ण का त्रैलोक्य विजय कवच, स्तवराज स्तोत्र व मंत्र कल्पतरु भी प्रदान किया। चक्रतीर्थ में परशुराम की कठिन तपस्या से प्रसन्न होकेर भगवान विष्णु ने परशुराम को रामावतार होने पर तेजोहरण के उपरांत कल्पांत पर्यांत तपस्यासरत् भूलोक पर रहने का वर दिया। यही कारण है कि त्रेता के परशुराम द्वापर में भी अपनी भूमिका निभाते दिखाई दिए और कलियुग में भी उनकी भूमिका सुनिश्चित है। यह भूमिका है भगवान विष्णु के 24वें कल्कि अवतार का गुरुपद स्वीकार कर उन्हें शस्त्र विद्या देने की। इसीलिए यह केवल मान्यता नहीं, अपितु विश्वसनीय सत्य है कि यदि परशुराम ने त्रेता में जन्म लेकर द्वापर में भी अपनी भूमिका निभाते देखे गए, तो निश्चित ही वे आज भी जीवित हैं और भगवान विष्णु के कल्कि अवतार के समय गुरु के रूप में अपनी भूमिका निभाते पुन: दिखाई देंगे।