त्रेता की त्यागिनियाँ : किसी ने छोड़ दिया वैभव, तो किसी ने किया विरह वरण

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आलेख : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद। भव्य भारत की आदि-अंत रहित सनातन संस्कृति में त्याग का सर्वाधिक महत्व दर्शाया गया है। सृष्टि के आरंभ से लेकर वर्तमान भारत में भी त्याग की अवधारणा बराबर बनी रही है। यही कारण है कि विश्व व्यापक विकराल CORONA (COVID 19) के भयावह संक्रमण काल में भी विकासशील भारत ने अति विकसित व समृद्ध अमेरिका सहित कई राष्ट्रों की अर्थ से लेकर औषधि तक सहा कीयता की है। निहित स्वार्थ से ऊपर उठ कर भारत कोरोना यानी कोविड 19 वायरस को विफल बनाने में समूचे विश्व में नेतृत्वकर्ता व मार्गदर्शक राष्ट्र के रूप में उभरा है और इसके पीछे कारण है भारत की भव्य, प्राचीन, वैज्ञानिक व आधुनिकता से युक्त सनातन संस्कृति, जिसका मूलमंत्र है, ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’। इसी मूलमंत्र को साकार करने का सबसे उत्तम साधन है, ‘त्याग’। हमारे देश में तो यह महान प्रेरक वाक्य भी प्रचलित है, ‘त्यागे सो आगे।’

भारत में त्याग की यह परंपरा वंशानुगत है, जो पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही है और वर्तमान आधुनिक पीढ़ी में भले ही त्याग का बल, महत्व, प्रभाव व परंपरा थोड़ी निर्बल हुई हो, परंतु आज भी देश में निहित स्वार्थ से ऊपर उठ कर निष्काम भाव से दान कर त्याग भावना का परिचय दे रहे हैं, तो इसके पीछे अनादिकाल से चली आ रही हमारी त्याग की सांस्कृतिक धरोहर है। आज हम त्याग की ऐसी ही पाँच प्रतिमूर्तियों की चर्चा करने जा रहे हैं, जो त्रेता युग की महान त्याग-तपस्विनियाँ थीं। चूँकि दूरदर्शन पर त्रेता युग की कथा ‘रामायण’ का प्रसारण हो रहा है, तब इन पाँच त्रेता की इन त्यागिनियों व उनके त्याग का वर्णन करना न केवल प्रासंगिक होगा, अपितु आधुनिक पीढ़ी, विशेषकर कोटि-कोटि वंदनीय नारी समाज के लिए प्रेरणादायक भी होगा।

सीता

मिथिला नरेश जनक की पुत्री तथा मिथिला साम्राज्य की राजकुमारी सीता जन्म से लेकर विवाह से पूर्व तक केवल एवं केवल राज-वैभव के सुखों में पलीं तथा बढ़ीं। जिनका पिता राजा हो, उनकी पुत्री को भला क्या दु:ख हो सकता था ? माता-पिता के सुकोमल स्नेह, ममता व प्रेम में बचनप से लेकर युवावस्था तक सीता मात्र सुखों की सैय्या समान जीवन यापन कर रही थीं, परंतु दशरथ-कौशल्या नंदन राम से विवाह क्या हुआ, सीता के सुखी जीवन पर मानो कुदृष्टि पड़ गई। यद्यपि यह विधि का विधान था, परंतु उस विधान के अनुसार अयोध्या नरेश दशरथ अपनी पत्नी कैकेयी को दिए वचनानुसार केवल राम को वन भेजने को विवश थे। कैकेयी ने राम के अतिरिक्त और किसी का नाम नहीं लिया था, परंतु यहाँ फलों के बिछौनों में पलीं जनक नंदिनी ने स्वामी सेवा धर्म का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत किया। अयोध्या का राजसुख का सीता ने इस प्रकार क्षण भर में त्याग कर दिया। वनवास की कठोर कठिनाइयों से अवगत कराने के पश्चात् भी सीता ने स्वामी-पति धर्म निभाने के लिए राज-वैभव एवं विलास का त्याग कर दिया और राम के साथ वन को निकल पड़ीं। इतना ही नहीं, 13 वर्ष वन विचरण की कठोर यातनाएँ सहने के पश्चात् जब रावण द्वारा अपहरण किया गया, तब सीता ने लंका में जाकर अपने पतिव्रत धर्म एवं सतीत्व की शक्ति को कुश के एक तिनके में धारण कर लिया, जिसके चलते महाबलशाली रावण सीता को स्पर्श तक न कर सका। इतना ही नहीं, सीता ने पति राम के लोकलाज धर्म को भी पूर्ण रूप से स्वीकार किया और 14 वर्षों के वनवास के बाद पुन: प्राप्त अयोध्या की महारानी का वैभव छोडा और पुन: वनगमन के लिए प्रस्थान किया।

उर्मिला

उर्मिला के त्याग पर तो भारतीय साहित्यकारों व मर्मज्ञों ने बहुत कुछ लिखा है। यह भी जनक पुत्री थी व स्वाभाविक रूप से सीता समान सभी राजसुखों में पली-बढ़ी थी। यद्यपि उर्मिला को कठोर वनवास नहीं भुगतना पड़ा, परंतु वन में न जाकर भी उर्मिला ने जो त्याग किया, उसे सीता से रत्ती भर भी कम नहीं आँका जा सकता। जब राम के वनवास का समाचार दशरत-सुमित्रा नंदन लक्ष्मण ने सुना, तो वे विह्वल हो उठे। लक्ष्मण ने अपना पूरा जीवन राम की सेवा में समर्पित करने का प्रण ले रखा था। ऐसे में जब राम के वनवास की बात आई, तो लक्ष्मण भ्रातृ कर्तव्य व पति कर्तव्य के धर्म संकट में पड़ गए, परंतु उन्होंने भ्रातृ सेवा का ही चयन किया। लक्ष्मण ने उर्मिला के समक्ष जब राम के साथ वन जाने का निर्णय सुनाया, तो उर्मिला ने महान त्याग करते हुए पतिव्रत धर्म की राह में अवरोध न डालने का निर्णय किया। राम के साथ जाने के लक्ष्मण हठ व तर्क के आगे उर्मिला न केवल नतमस्तक हो गई, अपितु उसने भी 14 वर्षों तक राजमहल में रह कर पति के कर्तव्य प्रण को पूर्ण करने में विरह का वरण किया। उर्मिला के त्याग को तो सीता के त्याग से भी महान बताया गया है, क्योंकि सीता तो पतिव्रत धर्म का पालन करते हुए राम के साथ वनवास गईं, परंतु उर्मिला ने लक्ष्मण के भ्रातृसेवा प्रण को साकार करने के लिए अपने जीवन को ही वन बना दिया।

मांडवी

विदेही जनक की एक और पुत्री मांडवी का नाम कैसे विस्मृत किया जा सकता है। दशरथ-कैकेयी नंदन भरत की भार्या मांडवी के त्याग की महिमा का अधिक बखान नहीं हुआ है, परंतु आप सोचिए कि जब महान भ्रातृ प्रेम की पराकाष्ठा के साक्षात् स्वरूप भरत ने अयोध्या में राजा का पद केवल राम की धरोहर मान कर संभालने तथा राम की भाँति 14 वर्षों तक राजमहल से बाहर वनवासियों की तरह कुटिया बना कर रहने का प्रण लिया, तब मांडवी ने भी उर्मिला की तरह ही अपने पतिव्रत धर्म को तुच्छ कर पतिप्रण धर्म को श्रेष्ठ धर्म के रूप में स्वीकार किया। मांडवी 14 वर्षों तक राजमहल में रही और तीनों माताओं की सेवा करती रहीं। इस प्रकार मांडवी के लिए सौभाग्य की बात केवल इतनी ही थी कि वह 14 वर्षों तक पति भरत के दर्शन तो कर सकी, परंतु उसने भी उर्मिला की तरह विरह का वरण कर त्याग व बलिदान की भावना को पराकाष्ठा तक पहुँचा दिया।

सुमित्रा

दशरथ की तीन पत्नियों में जहाँ एक ओर कौशल्या के अपने व सौतेले पुत्रों के प्रति समान वात्सल्य, प्रेम तथा ममता की सराहना होती है, वहीं कैकेयी को एक निष्ठुर सौतेली माँ के रूप में घृणादृष्टि से स्मरण किया जाता है, परंतु सुमित्रा की कोई विशेष भूमिका नहीं दिखाई देती। जिस राजघराने में पुत्रमोह में दशरथ जैसे धीर-गंभीर पुरुष ने विरह-वेदना सहने की क्षमता खो दी और प्राण त्याग दिए, उसी राजघराने में सुमित्रा जैसी ‘निर्मोही’ माँ भी थी। कौशल्या इसलिए दु:खी थीं कि उनके निर्दोष पुत्र राम को राज्याभिषेक के स्थान पर वनवास भोगना पड़ रहा है, तो कैकेयी पुत्र भरत के मोह में इतनी अंधी हो गई थी कि उसने कौशल्या से भी अधिक प्रेम करने वाले राम को वनवास का वचन मांगा, परंतु सिंहासन के इस संग्राम के परिणामस्वरूप जहाँ राम ने वनगमन और भरत ने राम की भाँति जीवन बिताने का प्रण लिया, वहीं सुमित्रा ने अपने दोनों पुत्रों लक्ष्मण एवं शत्रुघ्न को बड़े भाइयों क्रमश: राम एवं भरत की सेवा में समर्पित कर दिया। सुमित्रा ने इस त्याग से जहाँ लक्ष्मण का विरह वरण किया, वहीं राजमहल में रह कर भी शत्रुघ्न से पुत्र कर्तव्य की कोई अपेक्षा नहीं रखी, क्योंकि शत्रुघ्न पर कुटिया में रह कर शासन कर रहे भरत की सेवा व आज्ञा की अनुपालन का दायित्व था।

मंदोदरी

दानवराज मय की पुत्री मंदोदरी का भाग्य उसी दिन रूठ गया था, जब उसने अहंकारी रावण से विवाह किया। परस्त्री का हरण करने वाला रावण जब एक-एक डग अपने व अपने कुल के विनाश की ओर बढ़ रहा था, तब मंदोदरी ने बार-बार पतिव्रत धर्म का उत्तम पालन किया। मंदोदरी ने राह भटके पति को धर्म के मार्ग पर लाने के लिए एक बार नहीं, कई बार समझाया। वह रावण के आगे गिड़गिड़ाई। सीता को सकुशल लौटा कर राम की शरणागति स्वीकारने के लिए रावण को समझाने का मंदोदरी ने अंतिम समय तक प्रयत्न किया। मंदोदरी ने न केवल पत्नी, अपितु मित्रवत् भी रावण को धर्म व नीति के मार्ग पर लौटाने का प्रयास किया। आवश्यकता पड़ी, तो उसने पिता मय से भी सहायता मांगी। मंदोदरी ने सीता हरण के पहले दिन से लेकर राम के हाथों रावण के वध से पूर्व तक पतिव्रत धर्म का पालन किया, परंतु रावण के अहंकार के चलते मंदोदरी को अपने 7 पुत्रों, 1 देवर तथा स्वयं पति रावण के शवों पर विलाप करना पड़ा। यद्यपि मंदोदरी ने अंतिम साँस तक अधर्मी होने के पश्चात् भी पति का साथ नहीं छोड़ा।

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