यह तो ‘भगवान’ का ही विधान था कि एक सुंदर महानायिका को ‘मंथरा’ बनना पड़ा..!

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* ‘रामायण’ के कारण पुन: चर्चा में आईं ललिता पवार की 104वीं जयंती पर विशेष

आलेख : कपिल मिश्रा

अहमदाबाद। यदि जीव जगत में विशेषकर मानव योनि में प्रारब्ध, भाग्य, विधि का विधान एवं पूर्व कर्मों के फल जैसी बातों पर विश्वास किया जाता है, तो उसके पीछे कई सटीक कारण हैं। अक्सर लोग अपने बल, बुद्धि एवं सामर्थ्य से किए गए कर्म का सुफल प्राप्त होने पर अभिमान कर बैठता है कि उसकी सफलता का कारण उसका कर्म है, तो दूसरी तरफ विफलता मिलने पर वही व्यक्ति प्रारब्ध, किस्मत और यहाँ तक कि अपने भगवान तक पर दोष मढ़ देता है।

यद्यपि हम यहाँ कर्म सिद्धांत पर कोई उपदेश नहीं देने जा रहे, परंतु आज हम जिस व्यक्ति की बात करने जा रहे हैं, उस व्यक्ति के जीवन के उतार-चढ़ाव निश्चित रूप से इस बात को प्रमाणित करते हैं कि मनुष्य के हाथ में केवल कर्म करना है। इससे भी एक डग आगे बढ़ कर कहें, तो हर व्यक्ति के लिए उसके कर्म से पूर्व फल निश्चित होता है। सामान्यत: व्यक्ति फल की इच्छा व फल सुनिश्चित करके ही कर्म करता है, परंतु वह जानता नहीं कि उसके हर कर्म का फल पहले से ही निश्चित है और वह फल ही उसे फल से पूर्व किए जाने वाले कर्म का निश्चय कराता है। इसे ही प्रारब्ध, भाग्य, विधि का विधान, किस्मत आदि शब्दों से संबोधित किया जाता है, जो भारतीय फिल्म जगत (BOLLYWOOD) की एक महिला कलाकार के जीवन में साक्षात् साकार हुए हैं।

देश में CORONA (COVID 19) संकट के चलते गत 24 मार्च से लागू हुए LOCKDOWN के बीच दूरदर्शन ने अपने ही नहीं, अपितु तत्कालीन भारतीय टेलीविज़न इतिहास के सबसे लोकप्रिय धारावाहिक ‘रामायण’ का प्रसारण क्या प्रारंभ किया, पुन: एक बार रामायण की जड़ मंथरा तथा उसकी कुटिलता दर्शकों के सामने आ गई। त्रेता युग में मंथरा के रूप में चाहे किसी ने भी अवतार लिया होगा, परंतु कलयुग की ‘रामायण’ में ‘मंथरा’ की भूमिका एक ऐसी उत्कृष्ट, श्रेष्ठ व सुंदर कलाकार के भाग में आई, जो उसके लिए दुर्भाग्य भी था और सौभाग्य भी। आप कहेंगे, दोनों एक साथ कैसे हो सकते हैं ? परंतु यह सत्य है।

जी हाँ ! हम बात कर रहे हैं ललिता पवार की। वर्तमान में दूरदर्शन पर प्रसारित धारावाहिक ‘रामायण’ में दर्शकों ने प्रारंभिक प्रकरणों में ही 37 वर्ष पूर्व ‘मंथरा’ के रूप में देखी गईं ललिता पवार को पुन: एक बार देखा, जिससे ललिता पवार का नाम भी पुन: चर्चा में आ गया। यद्यपि इस ‘रामायण’ में ‘मंथरा’ की भूमिका लगभग समाप्त हो चुकी है, परंतु चूँकि आज ललिता पवार की 104वीं जयंती है, अत: हम आपके समक्ष ललिता पवार के जीवन की घटनाओं पर प्रारब्ध के बोझ की कथा प्रस्तुत करने जा रहे हैं।

जब अंबा ने स्वयं को सिद्ध किया ‘ललिता’

आप सोच रहे होंगे कि यह अंबा कौन है ? अंबा ललिता पवार का ही मूल नाम है, जो विख्यात नहीं है। महाराष्ट्र के नासिक जिले में छोटेृसे गांव येवले में 18 अप्रैल, 1916 को लक्ष्मण राव सगुन के घर जन्मी नन्हीं बालिका का नाम अंबा ही रखा गया था। कहा जाता है कि उनकी माँ अंबा माता के मंदिर में पूजा के लिए गईं, तभी उन्हें प्रसव पीड़ा हुई और नन्हीं बालिका का जन्म हुआ। इसी कारण उस बालिका का नाम लक्ष्मण राव सगुन ने अंबा ही रख दिया। उस दौर में लड़कियों-महिलाओं को इतनी स्वायत्तता नहीं थी, परंतु यह प्रारब्ध का ही खेल था कि 9 वर्ष की आयु में अंबा वर्ष 1927 में अपने भाई और पिता के साथ पुणे चली आईं। अंबा के मन में कलाकार पल रहा था। इसीलिए वह ‘आर्यन प्रोडक्शन्स’ पहुँच गई, जहाँ उसे फिल्म ‘पतित उद्धार’ में एक बाल कलाकार की भूमिका मिल गई। यहाँ स्मरण रहे कि जब अंबा ने अभिनय क्षेत्र में प्रवेश किया, तब भारत में मूक फिल्मों का दौर था। ‘पतित उद्धार’ में अंबा के पात्र का नाम ‘ललिता’ था। फिल्म में अंबा ने एक निर्दोष बच्चे की भूमिका निभा कर श्रेष्ठ अभिनय कौशल का प्रदर्शन किया। बस, फिर क्या था। पहली फिल्म के कैरेक्टर नेम ‘ललिता’ के रूप में ही अंबा की पहचान स्थापित हो गई। अंबा से ललिता बन चुकी इस कलाकार ने ‘आर्यन प्रोडक्शन्स’ के साथ 20 से अधिक फिल्में कीं। उन्होने मूक शब्दों को अपने प्रबल अभिनय कौशल से परिभाषित किया और ललिता के अर्थ कामिनी को साकार कर दिखाया। ललिता वास्तव में अपने अभिनय कौशल से दर्शकों के लिए कामिनी सिद्ध हुईं। इसके बाद तो उनके पास फिल्मों के अंबार लग गए अगले 18 सालों तक ललिता पवार विभिन्न प्रकार की भूमिकाएं करती रहीं। जब ललिता बड़ी हुईं, तो उन्होंने कई फिल्मों में मुख्य भूमिकाएँ की और “मूक फिल्मों की सबसे सम्मोहक सुंदरी” बन गईं।

एक फिल्म में 3 से लेकर 17 भूमिकाएँ निभाईं

वर्ष 1932 में, ललिता पवार ने ‘कैलाश’ नामक एक मूक फिल्म का निर्माण किया और उसमें अभिनय भी किया। इस फिल्म में ललिता ने नायिका, खलनायिका और माँ के रूप में तीन भूमिकाएँ निभाईं। वर्ष 1937 में, ललिता पवार ने एक अन्य फिल्म ‘दुनिया क्या है’ का निर्माण किया, जो एक टॉकी फिल्म थी। मराठी में उनकी कुछ सुपरहिट फिल्में थीं, ‘नेताजी पालकर’ (1938), ‘संत दामाजी’, ‘अमृत’, ‘गोरा कुंभार’। ललिता पवार ने ऐतिहासिक से सामाजिक, कॉस्च्युम ड्रामा से पौराणिक, कॉमेडी से लेकर ट्रैजेडी, रोमांचक से संगीतमय और गंभीर से लेकर रोमांसवाली फिल्मों में अभिनय किया। ललिता पवार की कुछ यादगार फिल्में हैं ‘ठाकसेन राजपुत्र‘’, ‘पृथ्वीराज चौहान’, ‘गमिनी कावा’, ‘चतुर सुंदरी’, ‘पद्मावती पारीनी’, ‘श्री 420’, ‘प्रेम बंधन’, ‘सॉञ्ग ऑफ लाइफ’, ‘दलेर’, ‘जिगर’। इनें दो फिल्में ‘ठकसेन राजपूत’ तथा ‘चतुर सुंदरी’ मुंबई के थिएटरों में रिकॉर्ड अवधि साथ तक चली थीं। ‘चतुर सुंदरी’ में ललिता ने 17 विभिन्न भूमिकाएँ निभाई थीं।

हे ‘भगवान’ ! एक थप्पड़ ने बना दिया नायिका से खलनायिका

वर्तमान समय पुरे विश्व के लिए बड़ी कठिनाई का है। इस दौरान सब अपने-अपने घरों में क़ैद है। कोरोना संकट के कारण जहाँ देश में 24 मार्च से आरंभ हुआ लॉकडाउन 3 मई तक बढ़ा दिया गया है, वहीं दूरदर्शन ने लोगों को घरों रहने पर विवश करने में सक्षम एवं धर्म, नीति, मर्यादा व आध्यत्मिक ज्ञान से परिपूर्ण “रामायण” धारावाहिक का जब प्रसारण आरंभ किया, तो 22 वर्ष पूर्व 1998 में देहत्याग कर चुकीं ललिता पवार दर्शकों के सामने “मंथरा” के रूप में पुन: प्रकट हुईं। यद्यपि रामायण में मंथरा की भूमिका खलनायिका की ही थी, परंतु क्या आप जानते हैं कि एक श्रेष्ठतम् बाल कलाकार से सम्मोहक अभिनेत्री की सफल यात्रा करने वालीं ललिता पवार को नायिका से खलनायिका बनने पर क्यों विवश होना पड़ा ? वास्तव में जिसे विधि का विधान या प्रारब्ध कहते हैं, उसी ने एक ऐसा खेल खेला कि एक सफलतम् नायिका को आजीविका चलाने के लिए खलनायिका बनना पड़ा। यद्यपि दुर्भाग्य से मिली इस चुनौती को भी ललिता पवार ने सौभाग्य में परिवर्त कर दिया। भारत जब 1942 में अंग्रेज़ी साम्राज्य के विरुद्ध निर्णायक लड़ाई लड़ रहा था, उसी वर्ष स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ी फिल्म ‘जंग-ए-आज़ादी’ की शूटिंग चल रही थी। फिल्म एक दृश्य में अभिनेता भगवान दादा को ललिता पवार को थप्पड़ मरना था। भगवान दादा के रूप में मानो स्वयं भाग्य विधाता ने ललिता पवार को इतना ज़ोर से थप्पड़ मारा कि ललिता पवार जमीन पर गिर गईं। उनके कान से खून निकलने लग। अस्पताल में इलाज के दोरान उन्हें लकवा आ गया और बाईं आँख सिकुड़ गई तथा सुंदर चेहरा कुरूप हो गया। अपने जीवन में आये इतने बड़े संकट बाद भी उनके जीवन में एक नया ही संघर्ष आरंभ हुआ। एक अभिनेत्री के लिए उसका रूप ही सब कुछ होता है, जो हरि ने हर लिया था, परंतु जिसके पास कला का धन होता है, वह धन कभी धोखा नहीं देता। यही कारण है कि ललिता पवार को अभिनेत्री की भूमिका ऑफर करने वाले निर्माता-निर्देशक अब उन्हें खलनायिका की भूमिका ऑफर करने लगे।

खलनायिका ने भी गाड़े सफलता के झंडे, सागर ने फिर याद किया

आजीविका चलाने तथा कला को जीवित रखने के उद्देश्य से ललिता पवार ने इस नई भूमिका को चुनौती के रूप में स्वीकार किया और इसमें भी सफलता के झंडे गाड़ दिए। वे हिन्दी-मराठी फिल्म जगत में अब ताने कसने वाली सास, नायक-नायिका के विरुद्ध षड्यंत्र करने वाली महिला जैसे रोल निभाने लगीं और फिल्मी दुनिया में एक ‘खडूस सास’ के रूप में प्रसिद्ध हुईं। अभिनय यात्रा के इस दूसरे पड़ाव में ही ललिता पवार ने 1961 में रामानंत सागर निर्मित फिल्म ‘सम्पूर्ण रामायण’ में पहली बार ‘मंथरा’ की भूमिका निभाई। भारतीय जनमानस पर रामायण का अत्यंत प्रभाव होने के कारण रामानंद सागर की यह फिल्म बहुत सफल रही तथा साथ ही मंथरा की भूमिका रूप में ललिता पवार ने प्राण फूँक दिए। ललिता ने मंथरा की भूमिका सफलतापूर्वक निभा कर लोगों का दिल जीत लिया। इसके बाद भी ललिता पवार ने अनेक फिल्मों में नकारात्क भूमिकाएँ निभाईं और उनकी फिल्मों का आँकड़ा 700 के पार पहुँच गया। इस दौरान उन्हें ‘अनाड़ी’ (1958) फिल्म में सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेत्री के लिए फिल्मफेयर अवॉर्ड तथा 1961 में अभिनय क्षेत्र का संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार दिया गया। जब रामानंत सागर ने ‘संपूर्ण रामायण’ फिल्म को 1886-87 में छोटे पर्दे पर धारावाहिक का रूप दिया, तो उन्हें मंथरा के रोल के लिए फिर एक बार ललिता पवार ही याद आईं और ललिता पवार ने छोटे पर्दे पर भी इस क़िरदार को जीवंत कर दिखाया।

एकांत में हुआ 70 वर्षीय अभिनय यात्रा का अंत

इतनी सफल बाल कलाकार, नायिका व खलनायिका का 70 वर्षीय करियर एक दु:खद मोड़ पर समाप्त हुआ। अंबा सगुन से ललिता सगुन बनीं इस अभिनेत्री ने गणपत पवार से विवाह किया और ललिता पवार के रूप में प्रसिद्ध हुईं, परंतु गणपत ने उन्हें धोखा देकर ललिता की छोटी बहन से प्यार किया। ललिता ने निर्माता राजप्रकाश गुप्ता से दूसरी शादी की। ललिता की संतान में एकमात्र पुत्र था। ललिता अपने जीवन के अंतिम दिन पति राजप्रकाश के साथ ठाणे स्थित अपने छोटे से बंगले ‘आरोही’ में व्यतीत कर रही थीं। 24 फरवरी, 1988 को अचानक ललिता पवार का निधन हो गया। दुर्भाग्य से उनके अंतिम समय में उनके पास घर का कोई सदस्य नहीं था। पति राजप्रकाश अस्पताल में भर्ती थे, तो बेटा अपने परिवार के साथ मुंबई में था। ललिता की मौत का रहस्योद्घाटन 3 दिन बाद तब हुआ, जब मुंबई से उनके बेटे ने माँ को फोन किया और किसी ने नहीं उठाया। इधर तीन दिनों तक घर में पड़े रहने के कारण ललिता के शव से दुर्गंध आने लगी। पुलिस ने घर का दरवाजा तोड़ा, तो घर में ललिता का शव पाया।