BBN EXCLUSIVE : विपत्ति को वरदान में पलटने वाले ‘इतिहास पुरुष’ हैं महानायक नरेन्द्र मोदी

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विश्लेषण : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद (24 अप्रैल, 2020)। 17 सितंबर, 1950 को भारत के पश्चिमी राज्य बॉम्बे में मेहसाणा जिले के वनडगर में जन्मे एक बालक की आयु आज 24 अप्रैल, 2020 शुक्रवार को 69 वर्ष 6 महीने और 7 दिन की हो चुकी है। निर्धनता व अभाव के थपेड़ों में जन्मा वह बालक आज विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश महान भारत का प्रधानमंत्री है। जब प्रत्येक साधारण व्यक्ति, फिर वह सम्पन्न हो या विपन्न, को जीवन में अनेक कठिनाइयों व चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, तो असाधारण व्यक्तियों को तो भीषण अग्नि परीक्षाओं का समुद्र लांघना पड़ता है और इस कार्य में वडनगर का वह लाल सदैव वीर व विजयी सिद्ध होता आया है।

जी हाँ ! हम बात कर रहे हैं नरेन्द्र मोदी की। जी नहीं, हम नरेन्द्र मोदी के वडनगर रेलवे स्टेशन पर चाय बेचने, हिमालय गमन से लेकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS-आरएसएस) तथा भारतीय जनता पार्टी (BJP-बीजेपी) में व्यतीत किए गए जीवन की नहीं, वरन् हम नरेन्द्र मोदी के 16 वर्ष 6 महीने 17 दिनों के उस राजनीतिक, शासनिकि व सार्वजनिक जीवन पर प्रकाश डालने जा रहे हैं, जिसका आरंभ उन्होंने 7 अक्टूबर, 2001 को गुजरात के मुख्यमंत्री का पदभार ग्रहण करते हुए किया था। मोदी के इन 16 वर्ष 6 महीने और 17 दिनों के जीवन पर दृष्टि डालने का उद्देश्य यही है कि देश के कोटि-कोटि नागरिकों को कोरोना (CORONA) संकट की इस घड़ी में यह आश्वासन मिल सके, ‘प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी कोरोना की भीषण आंधी में फँसी भारत की नैया को सुरक्षित पार लगाएँगे।’

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी समग्र विश्व में कोविड 19 (COVID 19) से निपटने में सबसे सफल नेता बन कर COVID COMMANDO सिद्ध हो चुके हैं। यदि संकट की इस घड़ी में भी पूरा विश्व मोदी के नाम की तालियाँ बजा रहा है, तो यह निश्चित है कि मोदी कोरोना के इस विराट विपत्ति को ‘भी’ न केवल वामन बनाने में सफल होंगे, अपितु इस अभिशाप को वरदान भी सिद्ध करके रहेंगे। यह बात इतने विश्वास व दावे के साथ इसलिए कही जा सकती है, क्योंकि गुजरात के मुख्यमंत्री से लेकर भारत के प्रधानमंत्री (PRIME MINISTER) तक के कार्यकाल में मोदी ने श्रीमद् भगवत गीता में भगवान श्री कृष्ण के श्लोक ‘यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत । अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥’ को साक्षात् चरितार्थ किया है। कृष्ण परमात्मा जहाँ यह श्लोक कह कर उद्घोष करते हैं, ‘“जब-जब इस पृथ्वी पर धर्म की हानि होती है और अधर्म आगे बढ़ता है, तब-तब मैं इस पृथ्वी पर जन्म लेता हूँ’, वहीं नरेन्द्र मोदी ने पिछले 16-17 वर्षों के जीवन के इस श्लोक का संदर्भ बदलते हुए उसे इस अर्थ में लिया है, ‘जब जब मुझ (गुजरात-भारत) पर विपत्तियाँ आती हैं, तब-तब मैं उन विराट विपत्तियों को वामन बना देता हूँ और विपत्ति रूपी अभिशाप को वरदान बना देता हूँ।’

मोदी के इतिहास में सुरक्षित भविष्य का दर्शन…

जब भूकंप के विनाशलीला के चिह्न मिटाए

कदाचित गुजरात से इतर शेष भारत के साधारण नागरिक को यह जानकारी नहीं होगी कि नरेन्द्र मोदी ने 7 अक्टूबर, 2001 को किन विपरीत व चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली थी, परंतु गुजरात का बच्चा-बच्चा और देश के बड़े-बड़े राजनीतिक पंडित तथा पत्रकारिता जगत के महानुभाव यह बात भली भाँति जानते हैं कि जब मोदी गांधीनगर में शपथ ग्रहण कर रहे थे, तब कच्छ से लेकर अहमदाबाद तक पूरा गुजरात 8 महीने व 11 दिन पहले आए महाविनाशकारी भूकंप की विभीषिका के बाद चहुँओर मलबों के ढेर में बदल चुका था। मोदी के समक्ष मुख्यमंत्री के रूप में सबसे पहली व कठिन चुनौती 26 जनवरी, 2001 को आए भूकंप के कारण मलबों में बदल चुके बीसियों महानगरों-नगरों तथा सैंकड़ों गाँवों को पुनर्जीवन देने की थी। मोदी ने सत्ता संभालते ही न केवल इस चुनौती से निपटने का कार्य युद्ध स्तर पर आरंभ किया, अपितु इस आपत्ति को अवसर में पलटने का अभियान भी छेड़ा। यही कारण है कि वैश्विक इतिहास में जहाँ भूकंप पुनर्वास की औसत अवधि 7 वर्ष थी, वहीं गुजरात में मोदी ने भूकंप की विनाशलीला के चिह्न 3 वर्ष में ही मिटा डाले। मोदी ने भूकंप पुनर्वास का जो कार्य किया, उसने न केवल भारत, वरन् विश्व बैंक (WORLD BANK) सहित समूचे विश्व का ध्यान खींचा।

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जब साम्प्रदायिक दंगों का इतिहास मिटाया….

नरेन्द्र मोदी आरएसएस व भाजपा में सांगठनिक कार्य कर रहे थे और अचानक उन्हें शासन-प्रशासन की राजनीति में आने का आदेश मिला, तो यह ही उनके लिए किसी चुनौती से कम नहीं था, परंतु मोदी ने इस चुनौती को सहर्ष स्वीकार किया। मोदी को सत्ता संभाले अभी डेढ़ महीना ही हुआ था। 26 फरवरी, 2002 को नरेन्द्र मोदी राजकोट 2 विधानसभा सीट का उप चुनाव जीत कर पहली बार विधायक बने थे। मोदी ने इस पहली चुनावी जीत का ठीक से ख़ुशी भी नहीं मनाई थी कि 27 फरवरी, 2002 को गोधरा में साबरमती एक्सप्रेस के S 6 डिब्बे में आग लगा दी गई। एस 6 डिब्बे में यात्रा कर रहे लोग अयोध्या में कारसेवा करके अहमदाबाद लौट रहे थे। गोधरा कांड के नाम से प्रसिद्ध इस घटना में 59 कारसेवकों की मौत हुई और उसी रात गुजरात में साम्प्रदायिक दंगों के इतिहास ने स्वयं को दोहराना आरंभ कर दिया। वडोदरा से आरंभ हुआ दंगों का सिलसिला 28 फरवरी को अहमदाबाद सहित पूरे गुजरात में फैल गया। देखते ही देखते दंगों की आग ने समृद्ध गुजरात में चहुँओर विनाश व मृत्यु का तांडव मचा दिया। दंगों से निपटने के लिए मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पूरी शक्ति झोंक दी और चार दिनों में ही इन दंगों पर नियंत्रण पा लिया। यद्यपि गुजरात के लिए दंगे कोई नई बात नहीं थी, परंतु गुजरात की जनता ने सपने में भी यह कल्पना नहीं की थी कि 2002 के दंगे, हिंसा, अशांति की आग अंतिम होंगे। मोदी ने अपनी शासनिक-प्रशासनिक सूझ-बूझ से दंगों के आदी हो चुके साधारण गुजरातियों ही नहीं, वरन् दंगाइयों तक को यह अनुभूति करा दी कि उनकी भलाई दंगों में नहीं, अपितु शांति में है। मोदी ने इन दंगों के बाद गुजरात को विकास की ऐसी दिशा दिखाई कि गुजरात के लिए साम्प्रदायिक हिंसा, दंगे-फसाद, अशांति और कर्फ्यू ने सदा के लिए विदा ले ली और पिछले 18 वर्षों से गुजरात में कोई भीषण साम्प्रदायिक दंगा नहीं हुआ, जिसकी नींव मोदी ने ही डाली थी।

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जब आलोचनाओं के पत्थरों से बनाया प्रगति-प्रतिष्ठा का अभेद्य दुर्ग

2002 के गुजरात दंगों में गुजरात से लेकर दिल्ली तक राष्ट्रीय राजनीति में भाजपा विरोधी राजनीतिक दलों को केन्द्र में सत्तारूढ़ अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग-NDA) सरकार को कटघरे में खड़ा करने का अवसर दे दिया। राम मंदिर निर्माण, धारा 370 निर्मूलन, समान नागरिक संहिता (UCC) जैसे मुद्दों के चलते पहले ही साम्प्रदायिक दल के आरोप झेल रही भाजपा पर कांग्रेस सहित सभी तथाकथित धर्मनिरपेक्ष दलों ने धावा बोल दिया और इस आक्रमण का लक्ष्य बने नरेन्द्र मोदी। वाजपेयी ने जहाँ नरेन्द्र मोदी को ‘राज धर्म’ निभाने की सीख दी, वहीं विरोधी दलों ने मोदी पर आलोचनाओं के पत्थर बरसाने शुरू कर दिए। यह वह दौर था, जब मोदी को गाली देना फैशन बन गया था और पंचायत स्तर का छुटभैया नेता भी मोदी को गाली देने में अपनी शान समझने लगा था। मोदी पर चहुँओर से प्रहार हो रहे थे, परंतु मोदी ने आलोचनाओं के इन पत्थरों से व्यक्तिगत व राजनीतिक प्रगति की अभेद्य दीवार बनाना शुरू किया। उनके इस अनुष्ठान में गुजरात विधानसभा चुनाव 2002 में गुजरात की जनता ने भी मत रूपी आहूति देकर योगदान दिया।

घरेलू ललकार-अमेरिकी इनकार पर कूटनीतिक प्रहार

लोकसभा चुनाव 2004 में गुजरात सहित देश भर में वाजपेयी के नेतृत्व वाले भाजपा नीत एनडीए गठबंधन को क़रारी शिकस्त का सामना करना पड़ा और इस पराजय का ठीकरा फोड़ा गया नरेन्द्र मोदी पर। केन्द्र में वाजपेयी सरकार का पतन हुआ, तो गुजरात में भी 26 में से 14 सीटों पर सिमट गई। लोकसभा चुनाव 1999 में 20 सीटें जीतने वाली तथा विधानसभा चुनाव 2002 बहुमत हासिल करने वाली भाजपा के प्रदर्शन में आई गिरावट के साथ ही नरेन्द्र मोदी को गुजरात में ही उनके विरोधी चुनौती देने हेतु लामबंद हो गए। डॉ. ए. के. पटेल (जो भाजपा के इतिहास में प्रथम 2 सांसदों में शामिल थे) के नेतृत्व में असंतुष्ट भाजपाइयों ने मोदी विरोधी दंदुभि बजा दी। राष्ट्रीय स्तर पर 2002 से ही मोदी को मुख्यमंत्री पद हटाने की मांग का दबाव झेल रहे भाजपा हाईकमान पर 2004 की हार के बाद यह दबाव पार्टी के भीतर से भी बढ़ने लगा, परंतु मोदी विचलित नहीं हुए। उन्होंने दबाव की राजनीति का कड़ाई से सामना किया और मुख्यमंत्री पद पर बने रहते हुए गुजरात में विकास की अलख जगाई। इसी दौरान 2012 में अमेरिका ने गुजरात दंगों को आधार बनाते हुए मोदी को वीज़ा देने से इनकार कर दिया, तो मोदी ने इस चुनौती को भी अवसर में पलट दिया। अमेरिका का यह निर्णय ऐसा था, जो भारत के आंतरिक मामलों में दखल समान था, जिसका केन्द्र में सत्तारूढ़ यूपीए सरकार को भी कूटनीतिक विरोध करना पड़ा और अनायास ही मोदी का समर्थन करना पड़ा। यद्यपि इन चुनौतियों के बीच भी मोदी का कद निरंतर बढ़ता रहा और हर आपत्ति, संकट, प्रहारों के पत्थरों से मोदी ने अपने आसपास सुदृढ़ दुर्ग खड़ा कर दिया। मोदी ने केवल और केवल गुजरात के विकास पर ध्यान केन्द्रित रखा, जिसकी धीरे-धीरे पूरे देश में प्रशंसा होने लगी और इसी कारण वे देश के सबसे लोकप्रिय नेता बन गए। इस उपलब्धि ने उन्हें देश के प्रधानमंत्री पद तक पहुँचा दिया।

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प्रधानमंत्री के रूप में भी मोदी ने इतिहास को दोहराया

2014 में पहली बार प्रधानमंत्री के रूप में शपथ लेने वाले नरेन्द्र मोदी ने जब सत्ता संभाली, तब चहुँओर पिछली सरकार के भ्रष्टाचार, लचर प्रशान व अव्यवस्था तथा अराजकता की चुनौतियों का अंबार था। PM नरेन्द्र मोदी ने धीरे-धीरे तथा एक-एक कर सभी चुनौतियों को अवसर में बदला। पहले पाँच वर्षों में मोदी ने जहाँ एक ओर राष्ट्र को बाह्य संकटों के समक्ष सुदृढ़ता के साथ खड़ा किया, वहीं समग्र विश्व में भारत की धूमिल हो चुकी प्रतिष्ठा को पुन: गौरवान्वित किया। दूसरे कार्यकाल में मोदी ने उन चुनौतीपूर्ण कार्यों को हाथ में लिया, जिन्हें देश के किसी पूर्व नेतृत्व ने हाथ में लेने का साहस नहीं किया था। मोदी ने ट्रिपल तलाक़, जम्मू-कश्मीर से धारा 370 व 35 ए निर्मूल, नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) सहित कड़े निर्णय किए। राजनीतिक लाभालाभ से ऊपर उठ कर मोदी ने राष्ट्रीय एजेंडा को सर्वोपरि रखा और इन निर्णयों से उत्पन्न हुई विपक्षी दलों व विरोधियों की चुनौतियों को अपने सुदृढ़ नेतृत्व की धार से काट दिया। कठोर, साहसी व निर्भीक निर्णयों को लेकर मोदी ने सिद्ध कर दिया कि वे राष्ट्र हित में हर विरोध रूपी हर विपत्ति को झेल लेंगे। मोदी ने इतिहास को पुन: दोहराया, तो इतिहास ने भी स्वयं को पुन: दोहराया तथा मोदी को राजनीतिक विरोधों के संकट के बीच और अधिक सुदृढ़ शासक व नेता बना दिया।

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विपत्तियों ने कसौटी, विरोधियों ने कुर्सी, तो मोदी ने कर्म को लक्ष्य बनाया

7 अक्टूबर, 2001 से 24 अप्रैल, 2020 तक के सार्वजनिक, शासनिक, प्रशासनिक व राजनीतिक जीवन में पीएम नरेन्द्र मोदी के विरुद्ध प्राकृतिक या मानवीय विपत्तियों ने कसौटी तथा राजनीतिक विरोधियों ने कुर्सी को लक्ष्य बनाया, परंतु मोदी ने कर्म योग को लक्ष्य बनाया और हर आपत्ति को अवसर तथा विरोध को वरदान में बदलने का चामत्कारिक कार्य किया। अपनी आध्यात्मिक शक्ति, सुदृढ़ राजनीतिक इच्छा शक्ति तथा दीर्घदृष्टि का पूरा उपयोग नरेन्द्र मोदी ने राष्ट्र हित में किया। भारत को भव्यता व दिव्यता दिलाने में आने वाली हर बाधा को धैर्यपूर्वक पार किया। लगभग 19 वर्षों के इस इतिहास में मोदी समर्थकों को कई बार लगा कि अब मोदी का बचना असंभव है, परंतु मोदी हर कठिन परिस्थिति में महानायक बन कर उभरे। आज भी जब भव्य भारत चीनी कोरोना वायरस की चपेट में है, तब मोदी ही 130 करोड़ नागरिकों के लिए आशा की एकमात्र किरण बने हुए हैं। न केवल भारत, अपितु समूचे विश्व में कोरोना से निपटने में मोदी ने स्वयं को महानायक सिद्ध कर दिखाया है। भारत जैसे घनी जनसंख्या वाले देश में भी कोविड 19 के विरुद्ध मोदी कोविड कमांडो सिद्ध हो रहे हैं। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने गुरुवार को जो ओछा बयान दिया, उसका इस प्रेरक आलेख में उल्लेख करना भी उचित नहीं समझा जा सकता।

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