अहमदाबाद : कष्टदायी रहा है कर्फ्यू का इतिहास, पहली बार ‘निरामय निषेधाज्ञा’

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FIRST TIME : 5 से 22 वर्षीय अमदाबादियों ने 14 अप्रैल, 2020 को पहली बार जाना कि कर्फ्यू क्या होता है ?

FIRST TIME : साम्प्रदायिक दंगों तथा मौत का तांडव नहीं, जीवनदायक CONCLUSIVE CURFEW !

FIRST TIME : रथयात्रा 1946 से उठा कर्फ्यू का फन 56 वर्षों यानी 2002 तक निरंतर डँसता रहा

आलेख : कवि प्रकाश ‘जलाल’

अहमदाबाद। गुजरात की आर्थिक राजधानी अहमदाबाद यानी युगों-युगों का गुंजायमान इतिहास। कर्णावती, अहमद-आबाद, अहमदाबाद और गुजराती भाषा में अमदावाद यह महानगर गुजरात का सबसे बड़ा व महत्वपूर्ण शहर है। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार अहमदाबाद में 5,577,940 लोग रहते हैं, जिनमें 2,938,985 पुरुष तथा 2,638,955 महिलाएँ हैं, परंतु आज अहमदाबाद महानगर की जनसंख्या 75 लाख से अधिक मानी जाती है। अहमदाबाद की कुल जनसंख्या में 10 से 24 वर्ष आयु वर्ग के किशोरों-युवकों की संख्या 1 करोड़ 78 लाख मानी जाती है, जिनके लिए 14 अप्रैल, 2020 का दिन एक नया ही अनुभव लेकर आया। वर्ष 2002 के बाद जन्मे और जिन्होंने 2006-07 में होश संभाला होगा, उन्होंने 14 अप्रैल, 2020 को पहली बार CURFEW का अनुभव किया। इन नवतरुणों-तरुणियों व नवयुवाओं ने कर्फ्यू शब्द सुना अवश्य था, परंतु साक्षात् देखा पहली बार है।

सर्वविदित है कि अहमदाबाद सहित समूचे गुजरात, भारत व विश्व में इन दिनों कोरोना (CORONA કે COVID 19) महामारी फैली है। भारत ने गत 24 मार्च, 2020 से कोरोना की चेन तोड़ने के लिए LOCKDOWN लागू किया है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा घोषित लॉकडाउन के पश्चात् भी यह कोरोना संकट इतना गहराया कि अहमदाबाद में पूरे 18 वर्षों के बाद कई क्षेत्रों में कर्फ्यू लगाना पड़ा, जिससे लोग घरों से बाहर न निकलें। अहमदाबाद शहर पुलिस ने 14 अप्रैल से पुराने अहमदाबाद व अन्य कोरोना हॉटस्पॉट क्षेत्रों में कर्फ्यू लागू किया, जिसकी अवधि 24 अप्रैल तक बढ़ा दी गई है। गोधरा कांड 2002 के बाद भड़के दंगों के दौरान अहमदाबाद में चार माह तक चला कर्फ्यू का सिलसिला बाद में तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में विकास की राह के बीच ऐसा थमा कि फिर कभी अहमदाबाद में कर्फ्यू की आवश्यकता ही नहीं पड़ी। अब जब 18 वर्षों बाद अहमदाबाद में पहली बार कर्फ्यू लगा है, तब अहमदाबाद में कष्टदायक कर्फ्यू के 74 वर्षों के इतिहास में पहली बार हिंसा या मौत का तांडव नहीं, अपितु ‘निरामय निषेधाज्ञा’ लागू की गई है।

2002 व 2020 में 4 का संयोग, परंतु यह कर्फ्यू सबसे निराला है…

अहमदाबाद में गोधरा कांड 2002 के बाद भीषण हिंसक घटनाएँ हुई थीं और शहर को चार माह तक कर्फ्यू का दंश झेलना पड़ा था। उसके बाद मोदी ने अहमदाबादियों को विकास की ऐसी राह दिखाई कि गुजरात का सबसे बड़ा महानगर हिंसा, दंगा-फसाद व कर्फ्यू से होने वाले नुकसान को अच्छी तरह पहचान गया। यही कारण है कि अहमदाबादियों ने 2002 के बाद फिर कभी कर्फ्यू लगाने की नौबत नहीं आने दी। यद्यपि 18 वर्ष अब जब कर्फ्यू आया है, तो वह भी सुखद् स्वा्थ्य की भावना के साथ आया है। इस बार के कर्फ्यू में चौंकाने वाला संयोग यह है कि 2002 के बाद 2020 में अहमदाबाद ने कर्फ्यू देखा और दोनों ही वर्षों के आँकड़ों का योग 4 ही होता है। यद्यपि यहाँ मूल मुद्दे से भटकने का प्रयास नहीं किया जा रहा, क्योंकि 2002 व 2020 के कर्फ्यू में धरती-आकाश का अंतर है, सुखद् विरोधाभास है। 2002 व उससे पूर्व के करफ्यू में जहाँ चंद हिंसक व धर्मांध लोगों के कारण पूरे शहर को जान-माल का भारी नुकसान उठाना पड़ता था, वहीं यह पहली बार है कि कर्फ्यू लोगों के स्वास्थ्य के लिए तथा लोगों के प्राणों की रक्षा के लिए लगाया गया। 2020 का यह कर्फ्यू एक प्रकार से सकारात्मक व निरामय निषेधाज्ञा है। इस कर्फ्यू का वास्तविक उद्देश्य कोरोना महामारी को परास्त करना है। अब जबकि 18 वर्षों के बाद अहमदाबाद में कर्फ्यू ने पुनरागमन किया है, तब आपको अहमदाबाद के कर्फ्यू के इतिहास से अवगत कराना प्रासंगिक बन जाता है।

1 जुलाई, 1946 को पहली बार लागू हुआ कर्फ्यू

गुजरात में लगभग राजनीतिक अस्थिरता का दौर बहुत लंबा चला। इस दौरान विभिन्न प्रकार के आंदोलन व साम्प्रदायिक हिंसा व दंगों की स्थिति में सरकार को कर्फ्यू लाग करना पड़ा। एक प्रकार से यह भी कहा जा सकता है कि अहमदाबाद में पहली बार कर्फ्यू 1 जुलाई, 1946 को लगाना पड़ा ता। वास्तव में यह वह समय था, जब देश अंग्रेज़ी साम्राज्य के विरुद्ध निर्णायक लड़ाई लड़ रहा था, परंतु साथ ही साथ धर्म आधारित विभाजन की मांग ने पूरे देश के हिन्दू-मुस्लिम ताने-बाने को छिन्न-भिन्न कर दिया था, जिससे अहमदाबाद भी अछूता नहीं था। इसी दौरान अहमदाबाद में जमालपुर स्थित जगन्नाथ मंदिर से अषाढ़ी दूज को निकलने वाली परंपरागत जगन्नाथ रथयात्रा 1 जुलाई, 1946 को निकाली गई। यह रथयात्रा मूलत: पुराने अहमदाबाद, जहाँ मुस्लिम बहुल आबादी है, से गुज़रती है। साम्प्रदायिक तनाव के बीच निकली इस रथयात्रा के दौरान ही जमालपुर में भयंकर साम्प्रदायिक हिंसा हुई तथा प्रशासन को पहली बार कर्फ्यू लगाना पड़ा। इसके बाद 1956 में बृहन्मुंबई राज्य से पृथक गुजरात के गठन की मांग को लेकर आरंभ हुए महागुजरात आंदोलन के दौरान कई बार कर्फ्यू लगाना पड़ा। 1 मई, 1960 को गुजरात की स्थापना के बाद 1969 में भयंकर साम्प्रदायिक दंगे हुए, 1974 में नवनिर्माण आंदोलन, 1975 में आपातकाल के दौरान, 1985 में साम्प्रदायिक हिंसा में बदल चुके आरक्षण विरोधी आंदोलन के दौरान, 1990 से 1992 के दौरान राम मंदिर आंदोलन काल में भी आए दिन कर्फ्यू लगाया जाता रहा।

कष्टदायक थे वे कर्फ्यू

कई बार अहमदाबाद में साम्प्रदायिक दंगों को रोकने के लिए सेना उतारनी पड़ी। 19 से 24 सितंबर, 1969 के दौरान हुए दंगों में 514 लोगों की मौत हो गई। 1974 में हुए नवनिर्माण आंदोलन के प्रणेता मनीषि जानी हाल में अहमदाबाद में रहते हैं और गुजराती लेखक मंडल नामक संगठन का कार्यभार देख रहे हैं। उन दिनों को याद करते हुए जानी कहते हैं, ‘आंदोलन 73 दिन चला था, जिनमें से 55 दिन कर्फ्यू लागू था। पहली बार 26 जनवरी, 1974 को गणतंत्र दिवस कर्फ्यू के बीच मनाया गया था। नवनिर्माण आंदोलन महंगाई के विरुद्ध था। इसीलिए उसे रोटी रमखाण (रोटी दंगा) भी कहते हैं।’ मनीषि जानी 1969 की हिंसा को याद करते हुए जोड़ते हैं, ‘1969 के दंगों में अहमदाबाद की जनता ने पहली बार व्यापक पैमाने पर कर्फ्यू का अनुभव किया था। 1956 में अहमदाबादियों ने पृथक गुजरात की स्थापना के लिए केन्द्र सरकार के विरुद्ध स्वयंभू कर्फ्यू घोषित किया था। 1981 व 1985 में आरक्षण विरोधी आंदोलन साम्प्रदायिक दंगों में बदल गया, जिससे शहर को कर्फ्यू का सामना करना पड़ा, तो 1990 से 1992 के दौरान राम मंदिर आंदोलन के समय बार-बार शहर की साम्प्रदायिक शांति भंग हुई।’

रथयात्रा व उत्तरायण थे हॉट डेज़

साम्प्रदायिक दंगों या अन्य कारणों से कभी भी कर्फ्यू लग जाता था और यही कारण है कि अहमदाबाद के लोगों को कर्फ्यू की आदत पड़ गई थी। लोग कर्फ्यू से अभ्यस्त व त्रस्त भी हो गए थे। विभिन्न घटनाओं व अवसरों पर कर्फ्यू का सामना करने वाले अहमदाबादियों के लिए 1 जुलाई, 1946 की रथयात्रा से शुरू हुआ कर्फ्यू का सिलसिला 74 वर्षों तक जारी रहा। इसके बाद तो मुस्लिम बहुल पुराने अहमदाबाद से गुज़रने वाली इस रथयात्रा में 2001 तक हर वर्ष कोई न कोई छोटा-बड़ा साम्प्रदायिक दंगा होता ही रहता। कई बार कुछ क्षेत्रों में कर्फ्यू लगाना पड़ता। इसी प्रकार उत्तरायण पर पतंगबाज़ी के त्योहार के दौरान भी पुराने अहमदाबाद में छतों पर पतंग कटने-काटने का उन्माद पथराव सहित साम्प्रदायिक तनाव में बदल जाता और शहर में कई बार कर्फ्यू लगाने की स्थिति आ जाती। इस प्रकार रथयात्रा व उत्तरायण अहमदाबाद शहर पुलिस व राज्य शासन-प्रशासन के लिए हॉट डेज़ बन चुके थे, परंतु 2002 के बाद हालात पूरी तरह बदल गए और पूरा अहमदाबाद हर उत्सव मिल-जुल कर साम्प्रदायिक सौहार्द के साथ मनाता रहा है, जिससे कष्टदायी कर्फ्यू ने 18 वर्षों से यहाँ से विदा ले ली है।

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